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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

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DevanagariHindipublished259 pages

Page 220 of 259

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Page 220

षोडश अध्याय ] [ ४७३
राज्य मे सभी मनुष्य सर्वाङ्ग मे तिलक लगाने लगे ।४। पद्म और रमा
के साथ जब कल्किजी शम्भल ग्राम में सुख पूर्वक निवास कर रहे थे,
तभी एक दिन उनके पिता विष्णुयशजी ने अपने पुत्र से देवताओ को
सन्तुष्ट करने वाले यज्ञ का अनुष्ठान करने को कहा ।५।
तच्छुत्वा प्राह पितरं कल्किः परमहर्षितः ।
विनयावनतो भूत्वा धर्मकामार्थसिद्धये ।६।
राजसूयैर्वाजपेयैरश्वमेधैर्महामखैः ।
नानायागै कर्मतन्त्रैरीजे क्रतुपति हरिम् ।७।
गङ्गायमुनोर्मध्ये स्नात्वावभृथमादरात् ।
कृपरामवसिष्ठाद्यैर्व्यास धौम्यकृतव्रणैः ।
अश्वत्थाममधुच्छन्दोमन्दपालैर्महात्मनः ।८।
दक्षिणाभिः समभ्यर्च्य ब्राह्मणान्वेदपारगान् ।६।
चव्यैश्चोष्यैश्च पेयैश्च पूगशष्कुलियावकैः ।
भोजयामास विधिवत्सर्वकर्मसमृद्धिभि ।१०।
पिता के वचन सुन कर हर्षित हुए कल्किजी ने विनय पूर्वक
कहा – धर्म, अर्थ और काम की सिद्धि के प्रयोजन से मैं कर्म तन्त्र विहित
राजसूय, वाजपेय और अश्वमेधादि महायज्ञो के अनुष्ठान द्वारा भगवान्
विष्णु को प्रसन्न करूँगा ।६-७। फिर कल्किजी ने कृपाचार्य, परशुराम,
वसिष्ठ, व्यास, धौम्य, अकृतव्रण अश्वत्थामा, मधुच्छन्द तथा मन्दपाल
आदि महात्मा महर्षियो और वेदज्ञानियो को आमन्त्रित कर उनका पूजन
किया । तदनन्तर गङ्गा-यमुना के मध्य मे स्थित यज्ञ मे दीक्षित होकर
उन्होने स्नान किया और दक्षिणा दी ।८-६। फिर उन्होने अनेक प्रकार
के चर्व्य, चोष्य, पेय, पूप, शष्कुलि और यावक आदि भोज्य पदार्थों
के द्वारा उन ब्राह्मणो को श्रेष्ठ भोजन कराया ।१०।
यत्र वह्निर्वृतं पाके वरुणो जलदो मरुत् ।११।
परिवेष्टा द्विजान्कामैः सत्रार्थै रतोषयत् ।