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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

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DevanagariHindipublished259 pages

Page 217 of 259

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Page 217

४७० ] [ कल्कि-पुराण
स्वरूपिणी को नमस्कार है ।७। आपकी महिमा से ही यह त्रिलोकी
पञ्चभूतात्मिका रूप से प्रकाशित है। काल, दैव, कर्म, उपाधि आदि
कोई भी विधाता द्वारा निश्चित भाव आपके प्रकाश के बिना प्रकाशित
नही हो सकता। ऐसी आप प्रभावती को मेरा नमस्कार है ।८। आप
ही पृथिवी में गन्ध, जल मे रस, तेज मे रूप, वायु में स्पर्श और आकाश
मे शब्द रूप से विविध रूपो मे प्रतिष्ठित रहती हैं। आप जगत् मे व्याप्त
विश्वरूपिणी को नमस्कार है ।६। आप ही ब्रह्मरूपा सावित्री है, भगवान्
विष्णु की लक्ष्मी, शंकर की भवानी तथा देवराज इन्द्र की शची हैं।
हे माये ! सम्पूर्ण विश्व मे आप इसी प्रकार व्याप्त हो रही हैं ।१०।
बाल्ये बाला युवती यौवने त्वन्नाधक्ये या स्थविरा कालरूपा
नानाकार्यैर्गगयोगैरूपास्या ज्ञानातीता कामरूपा विभासि ।११
वरेण्या त्व वरदा लोकसिद्धयासाध्वीधन्या लोकमान्या सुकन्या
चण्डी दुर्गा कालिका कालिकाख्या । नानदेशे
रूपवेशैर्विभासि ।१२।
तव चरणसरोज देवि ! देवादिवन्द्य यदि हृदयसरोजे ।
भावयन्तीह भक्त श्रुतियुगकुहरे वा सश्रुत
धर्म्मसम्पज्जनयति जगदाद्ये सर्वसिद्धञ्च तेषाम् ।१३।
मायास्तवमिद पुण्य शुकदेवेन भाषितम् ।
मार्कण्डेयादवाप्यापि सिद्ध लेभे शशिध्वज. ।१४।
कोकामुखे तपस्तप्त्वा हरिं ध्यात्वा वनान्तरे ।
सुदर्शनेन निहतो वैकुण्ठं शरण ययौ ।१५।
आप शैशवावस्था मे बाला, यौवनावस्था मे युवती और वृद्धा-
वस्था में वृद्धा रूप वाली रहती हैं। आप ही काल से कल्पित, ज्ञानातीता
और कामरूपा है। आप विभिन्न रूपो में प्रकाशित होने वाली ईश्वरी
का यज्ञ और योग के द्वारा पूजन किया जाता है। मैं आपकी वन्दना
करती हूँ ।११। हे वरेण्या ! आप ही उपासको को वरदात्री और सिद्धि
के देने वाली हैं। आप लोकों के द्वारा मान्या, साध्वी, एव सब प्रकार
से धन्या हैं। आप ही श्रेष्ठ कन्या, चण्डी, दुर्गा, कालिका आदि विभिन्न