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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

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DevanagariHindipublished259 pages

Page 213 of 259

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Page 213

४६६ ] [ कल्कि पुराण
फिर भ्रातृवत्सल कल्किजी ने कवि, प्राज्ञ और सुमन्त्र को शोम्भ,
पौण्ड्र, पुलिन्द और मगध देश का राज्य दिया । २५-२६। फिर जगदीश्वर
कल्किजी ने अपने गोत्र बान्धवो को वीकट, मध्यकर्नाटक, आन्ध्र, उड्र
कलिंग, अङ्ग और बगादि देश प्रदान किये ।२७। फिर स्वयं शम्भल में
रह कर विशाखयूप-नरेश को ककक और कपाल प्रदेशो का राजा
बनाया ।२८। तदनन्तर उन्होने कृतवर्म्म आदि पुत्रो को द्वारका देश के
मध्य मे स्थित चोल, बर्बर तथा कर्व आदि प्रदेशो का राज्य प्रदान किया
।२६।
पित्रे धनानि रत्नानि ददौ परमभक्तितः ।
प्रजाः समाश्वास्य हरिः शम्भलग्रामवासिन. ।३०।
पद्मया रमया कल्किर्गृहस्थो मुमुदे भृशम् ।
धर्मश्चतुष्पादभवत्कृतपूर्णां जगत्त्रयम् ।३१।
देवा यथोक्तफलदाश्चरन्ति भुवि सर्वतः ।
सर्वशस्या वसुमती हृष्टपुष्टजनावृता ।
शाठ्याचौर्यान्तृतेर्हीना आधिव्याधिविवर्जिता ।३२।
विप्रा वेदविदः सुमङ्गलयुता नार्यस्तु चार्याव्रतैः ।
पूजाहोमपरा. पतिव्रतधरा यागोद्यता क्षत्रियाः ।
वैश्या वस्तुषु धर्मतो विनिमयैः श्रीविष्णुपूजापरा ।
शूद्रास्तु द्विजसेवनाद्धरिकथालापाः सपर्यापरा. ।३३।
फिर भगवान् कल्किजी अपने पिताको अत्यन्त भक्तिपूर्वक धन-रत्न
आदि भेंट करके और शम्भल ग्राम के निवासियो को सन्तुष्ट करके रमा
और पद्मा के साथ गृहस्थाश्रम के सुख भोगने लगे । तब तक धर्म के
चारो चरणो सम्पन्न हुए तीनो लोको में सत्युग का आविर्भाव हो गया
।३०-३१। भक्तो को इच्छित फल प्रदान करते हुए देवगण सम्पूर्ण
पृथिवी पर विचरण करने लगे । धरा के सब धान्यो से परिपूर्ण होने
के कारण सभी प्राणी हृष्ट-पुष्ट हो गए । शाठ्य, चौर्य अनृत, आधि,