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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages

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Page 190

एकादश अध्याय ] [ ४४३
छ सहस्र रथ, छः सो युवती दासियां तथा असख्य रत्नादि प्रदान करके
अपने स्वजनो और बांधवो के सहित अपने को धन्य माना। २१-२३।
राजा शशिध्वज के मुख से उनके पूर्व जन्म का वृत्तान्त सुन कर सभी
सभासद् आश्चर्य चकित होकर उन्हे पूर्ण समझने लगे २४। फिर वहाँ
उपस्थित सभी जन कल्किजी का भक्तिपूर्वक ध्यान करने लगे। फिर
उन्होने भक्तो के लक्षण विषयक प्रश्न राजा शशिध्वज से किया। २५।
भक्तिकाम्यद्भगवतः को वा भक्तो विधानवित् ।
किं करोति किमश्नाति क्त्वा वसति वक्ति किम् । २६।
एतान्वर्गान् राजेन्द्र ! सर्वं त्व वेत्सि सादरात् ।
जातिस्मरत्वात्कृष्णस्य जगता पावनेच्छया । २७।
इति तेषा वच. श्रुत्वा प्रफुल्लवदनो नृप ।
माधुवादे समामन्त्र्य तानाह ब्रह्मणोदितम् । २८।
पुरा ब्रह्मसभामध्ये महर्षिगणसङ्कुले ।
सनकोनारद प्राह भवद्भिर्यास्तिवहोदिताः । २९।
तेषामनुग्रहेणाह तत्रोषित्वा श्रुताः कथाः ।
यास्ता सकथयामीह शृणुध्व पापनाशना. । ३०।
राजागण बोले—भगवद्भक्ति क्या है ? विधान के जानने वाला
भक्त कौन कहा जाता है ? भक्त का कार्य क्या है ? वह क्या खाता,
क्या वार्तालाप करता और कहाँ रहता है ? । २६। हे राजेन्द्र ! आपको
सब कुछ विदित है, इस लिए आप कृपया आदरपूर्वक सब बात हमे
बतावे । उनकी बात मुन कर राजा शशिध्वज ने हर्षित मुख से उन्हे
साधुवाद दिया । फिर जाति स्मरण होने के कारण श्री कृष्ण चरित्र द्वारा
ससार को पवित्र करने के उद्देश से उन्होने वह सब कहना आरम्भ
किया, जो उन्होने ब्रह्माजी के मुख से सुना था । २७-२८। शशिध्वज बोले
पुराकाल की बात है—ब्रह्माजी की सभा के मध्य महर्षिगण विराजमान
थे, उसी अवसर पर जो कुछ सनकादि ने नारदजी से पूछा था, वही
आपको बताता हूँ । २६। उस समय मैं भी वहाँ उपस्थित था, इसलिए