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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

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DevanagariHindipublished259 pages

Page 187 of 259

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Page 187

४४० ] [ कल्कि-पुराण
यह शक्ति आपको किस प्रकार उपलब्ध हो सकी ? ।३४। हे राजन् ! इस
भक्ति की क्या आपने किसी से शिक्षा प्राप्त की है ? अथवा यह भक्ति
आप मे स्वाभाविक रूप से ही उत्पन्न हो गई है ? हे राजन् ! आपकी
इस भगवद्भक्ति का कारण सुनने की हमे जिज्ञासा है। क्योकि भगवद्भक्ति
की यह कथा ससार के आवागमन को नाश करने वाली है ।५।
स्त्रीपुंसोवयोरेस्तत्तच्छृणुतामोघविक्रमा ।
वृत्तं यज्जन्मकर्मादि स्मृति तद्भक्तिलक्षणम् ॥६॥
पुरा युगसहस्रान्ते गृध्रोऽह पूतिमासभुक् ।
गृध्रीय मे प्रियारख्ये कृतनीडो वनस्पतौ ॥७॥
चचार काम सर्वत्र वनोपवनसकुले ।
मृताना पूतिमांसौधै प्राणिना वृत्तिकल्पकौ ॥८॥
एकादा लुब्धक क्रूरो लुलोभ पिशिताशिनौ ।
आवा वीक्ष्य गृहे पुष्ट गृध्र तत्राप्ययोजयत् ॥६॥
त वीक्ष्य जातविश्रम्भौ क्षुधया परिपीडितौ ।
स्त्रीपु सौ पतितौ तत्र मासलोभितचेतसौ ॥१०॥
इस पर राजा शशिध्वज बोले—हे राजाओ ! हम दोनो पति-
पत्नी के जो जन्म, कर्म आदि हैं तथा जिस प्रकार हम को भगवद्भक्ति
का स्मरण हुआ, वह सब आप सुनिये ।६। एक सहस्र युग पहले की
बात है—मैं मांसाहारी गृद्ध था और मेरी यह प्रिया सुशान्ता मेरी पत्नी
गृद्धिनी थी । हम दोनो एक विशाल वृक्ष पर नीड बना कर उसमे
रहते थे ।७। वन-उपवन आदि स्थानो मे हमारी इच्छानुसार अबाध
गति थी । उस समय हम मरे हुए प्राणियो के दुर्गंधित मांस से अपना
जीवन-निर्वाह किया करते थे ।८। एक दिन एक क्रूर व्याध ने हमे देख
लिया और लोभवश हमे पकडने के लिए उसने अपने पालित गृद्ध को
हमारे समक्ष छोड दिया ।६। मैं क्षुधा से व्याकुल था, तभी मैने उसे
देखा मांस के लोभ से हम स्त्री-पुरुष दोनो ही उस पर झपट पडे ।१०।
बद्धावावां वीक्ष्य तदा हर्षादागत्य लुब्धकः ।
जग्राह कण्ठे तरसा चञ्च्वाघातात्पीडित ॥११॥