कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in context३७४ ] [ कल्कि पुराण
वे मुनिगण उस मार्ग का दर्शन करने लगे जो राक्षसी के स्थान
को जाता था । वहाँ पहुँच कर उन्होंने उस मेघाकार राक्षसी को गिरि
शिखर पर अपने पुत्र को स्तन-पान कराते हुए देखा ॥२१॥ बन के
हाथी उसकी श्वास-वायु के थपेडे खाकर दूर जा गिरते हैं तथा उसके
कानों के छेदों में सिंह पडे सो रहे हैं ॥२२॥ उसके रोम छिद्रों को
गिरि-गुहा समझ कर अपने पुत्र पौत्रों से युक्त हरिण गण भी उनमें
घुस कर सो रहे हैं ॥२३॥ वहाँ रह कर व्याध के भय से बचे हुए हैं
तथा लीख के समान स्थित हैं। पर्वत की चोटी पर अन्य पर्वत के
समान स्थित उस राक्षसी को देख कर हत बुद्धि एवं भयभीत तथा
शस्त्रास्त्र त्याग कर भागने को उद्यत अपने सैनिकों से भगवान् कल्कि
बोले ॥ २४-२५ ॥
गिरिदुर्गंवह्निदुर्गं कृत्वा तिष्ठान्तु मामकाः ।
गजाश्वरथयोधा ये समायान्तु मया सह ॥२६॥
अह स्वल्पेन सैन्येन याम्यस्याः समुख शनैः ।
प्रहर्तुं बाणसन्दोहैः खङ्गशक्तिपरश्वधै, ।॥२७॥
इत्युक्त्वास्थाप्य पश्चात्तान्बाणैस्ता समहनद्बली ।
सा क्रुधोत्थाय सहसा ननर्द्द परमाद्भुतम् ॥२८॥
तेन नादेन महता वित्रस्ताश्चाभवञ्जनाः
निपेतु सैनिका. सर्वे मूर्च्छिता धरणातले ॥२६॥
सा रथांश्च गजांश्चापि विवृत्तास्या भयानका ।
जघास प्रश्वासवातैः समानीय कुथोदरी ॥ ३०॥
उन्होंने कहा - इस पर्वतीय, दुर्ग में अग्नि दुर्ग बना कर तुम
सब यही ठहरो तथा गजारूढ, अश्वारूढ और रथी वीर हमारे साथ
आगे बढ़े ।। २६ ।। मैं अल्प सेना को साथ लेकर बाणों, तलवारों
और फरसों के द्वारा प्रहार करने के लिए अग्रसर होता हूँ ॥२७॥
यह कह कर कल्कि जी ने सेना को तो पीछे छोडा और आगे बढ़ कर
राक्षसी पर बाणों से प्रहार करने लगे । यह देख कर राक्षसी ने भी