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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages

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३६२ ] [ कल्कि पुराण
था तथा किरीट के अग्रभाग मे विविध प्रकार की जडी हुई मणियां चमक
रही थी ।४८। कामनियो के नयनो को आनन्द देने वाले रस के सदन
रूप कल्किजी उस समय शत्रु-पक्ष को विक्षिप्त करने के उद्देश्य से उनकी
ओर कटाक्ष करने लगे ।४६। भक्तजन अपने भगवान् कल्किजी के चरणा-
रविन्दो का दर्शन करके उल्लसित हो उठे और धर्म-निन्दक बौद्धगण
भय से कांपने लगे ।५०।
जहृषुः सुरसङ्घाः खे यागाहुतिहुताशनाः ।५१।
सुबलमिलनहृषः शत्रुनाशंतकर्ष समरवरविलास
साधुसत्कारकाश । स्वजनदुरितहर्त्ता जीवजातस्य
भर्त्ता रचयतु कुशल व. कामपूगवतार ।५२।
यह देख कर आकाश मे स्थित देवता कहने लगे कि अब युद्ध-
भूमि रूपी यज्ञस्थल मे स्थित अग्नि मे पुन आहुति डाली जाने को है
।५१। जो अस्त्रशस्त्रो से सुसज्जित सेनाओ को इकट्ठी करके शत्रुओं को
नष्ट करने वाले, लीलापूर्वक सग्राम मे तत्पर साधुओ के सत्कार-कर्त्ता,
स्वजनो के दु खो का विनाश एव सब प्राणियो का भरण करने वाले है,
वे सतो की अभिलाषा पूर्ण करने वाले भगवान् कल्किजी सब प्रकार
कल्याण करे ।५२।
० ॥ द्वितीय अंश समाप्त ॥