कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextषष्ठम अध्याय-२ ] [ ३५५
शूलेन तुरगं विद्वा कल्कि बाणेन मोहयन् ।
क्रोडीकृत्य द्रुतं भूमेर्नाशक्तस्तोलना हत ।५।
जिनो विश्वम्भरं ज्ञात्वा क्रोधाकुलितलोचनः ।
चिच्छेदास्य तनुत्राणं कल्केः शस्त्रञ्च दासवत् ।७।
विशाखयूपोऽपि तथा निहत्य गदया जिनम् ।
मूर्च्छितं कल्किमादाय लीलया रथमारुहत् ।८।
लब्धसञ्ज्ञस्तथा कल्किः सेवकोत्साहदायकः ।
समुत्पत्य रथात्तस्य नृपस्य जिनमाययौ ।६।
शूलव्यथां विहायजौ महासत्त्वस्तुरङ्गम
रिगणैर्भ्रमणैः पादविक्षेपेहननैर्मुहुः ।१०।
दण्डाघातैः सटाक्षेपैर्बौद्धसेनागणान्तरे ।
निजघान रिपून्कोपाच्छतशोऽथ सहस्रशः ॥११॥
उसने अपने शूल से अश्व को विद्ध कर दिया तथा बाण से
कल्किजी को सम्मोहित कर अंक मे भरने लगा, परन्तु उसे सफलता नही
मिली ।५। जिन न कल्कि को विश्वंभर रूप जान लिया और क्रोध पूर्वक
नेत्रो से उन्हे बदी के समान देखना हुआ, उसने उनके शस्त्रास्त्र और
कवच को छिन्न-भिन्न कर दिया ।७। यह देख कर विशाखयूप-नरेश ने
अपनी गदा से जिन को आहत कर दिया और लीला पूर्वक मूर्च्छित हुए
कल्किजी को लेकर रथ पर चढ गये ।८। जब उन्हे चेत हुआ, तब वे
भक्तो को उत्साह देने वाले कल्किजी राजा के रथ से उतर कर जिन के
सामने पहुँचे ।६। कल्किजी का अश्व भी शूल की वेदना को भूल कर
युद्धभूमि मे कूद पडा और घूमता हुआ पदाघात, दन्ताघात, केशघात
आदि के द्वारा बौद्ध सेना के हजारो वीरो को क्रोधपूर्वक मारने
लगा ।१०-११।
निश्वासवातैरुड्डीय केचिद्द्दीपान्तरेऽपतन् ।
हस्त्याश्वरथसङ्घाधाः पतिता रणमूर्द्धनि ।१२।