कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in contextउसके केशों को उल्लसित करके बार-बार मुख को देख रही थी ।
ऊपर और नीचे की ओर कम्पित शिर वाली शोक से व्याकुल
इन्द्रियों से समन्वित हुई पाँचों अंगुलियों से अपने वृक्ष-स्थल और शिर
को पीट रही थी। उस विजया ने अश्रुओं से युक्त कण्ठ वाली होती
हुई यह वचन कहा था। माता वीरणी तेरे मरण का श्रवण करके शोक
से कर्षित हो जायेंगी। वह माता कैसे प्राणों को धारण करने वाली
होगी। वह तो तुरन्त ही जीवन को त्याग देगी। उसके द्वारा क्रूर कर्म
करने वाले आपके पिता कैसे होंगे? आपको मृत सुनकर कोई कैसे
अपना जीवन धारण करेगा। आपके प्रति निश्चय ही अपने कर्मों का
विचिन्तन करके उस समय शोक से व्याकुल दक्ष ने ये बहुत ही क्रूर
एवं कठोर कर्म किए थे और ज्ञान से हीन वह यजन करने वाला होकर
कैसे कर्म के करने में प्रवृत्त हो रहे हैं क्योंकि वह श्रद्धा से रहित और
बुद्धि का त्याग कर देने वाला है। हा! माता! बालक की भाँति रुदन
करती हुई मुझे कुछ उत्तर तो दो। भक्ति से दयाशून्य मैं शोक से अपने
प्राण शल्य के ही समान धारण कर रही हूँ। हे माता! क्या किसी समय
में शम्भु के द्वारा विहित का स्मरण कर रही हो ?
आपका वही सचन चक्षु, मुख और नासिका से सभी हैं। इन
सबके सब विभ्रम इस समय में कहाँ चले गये हैं और आपका वह
हसित भी कहाँ चला गया है? वे भगवान् शम्भु आपके विभ्रमों से
हीन, सुन्दर नासिका से युक्त नेत्रों से युग्म वाले मन्द हास से रहित,
आपके मुख को देखकर कैसे सहन करेंगे? हे माता! आपके बिना हर
के आश्रम में समागत हुओं को बार-बार सुधा के तुल्य सुवृत वाक्य को
कौन कहेंगी? बान्धवों में श्रद्धा वाली और पति के भावों के वश में
अनुगमन करने वाली, सुलक्षणों से पूर्ण उसके समान अब कौन होगी।
'हे देवी! अब आपके बिना देवेश्वर शम्भु शोक से उपहत चेतना वाले
होकर दुःखित आत्मा से युक्त-निरुत्साह और चेष्टा रहित हो जायेंगे।
इस रीति से विशेष रूप से दुःखित होकर सती के प्रति विलाप करती
हुई विजया सती को मृत देखकर अत्यधिक शोक से आहत हो गयी