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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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५४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
गए थे। ब्रह्माजी और हरि भगवान् बहुत ही प्रसन्न हुए जो कि सावित्री
और कमला से संयुत थे। कामदेव भी महादेव जी के वचन का श्रवण
करके अपने मित्र ( बसन्त ) के सहित और पत्नी रति के साथ में
आमोद से युक्त हो गया था। उसने विविक्त रूप वाला होकर शम्भु
को प्राप्त कर निरन्तर बसन्त को विनियोजित कर वहीं पर स्थित
हो गया।
सती से विवाह प्रस्ताव
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इसके अनन्तर सती ने पुनः शुक्ल पक्ष
की अष्टमी तिथि में उपवास किया था और आश्विन मास में देवेश्वर
का भक्ति भाव से पूजन किया था। इस तरह से इस नन्दा व्रत के पूर्ण
हो जाने पर नवमी तिथि में दिन के भाग में भक्तिभाव से परमाधिक
विनम्र उस सती को भगवान् हर प्रत्यक्ष हो गये थे अर्थात् सती के समक्ष
में प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित हो गए थे। प्रत्यक्ष रूप से हर का
अवलोकन करके सती आनन्द युक्त हृदय वाली हो गयी थी। फिर उस
सती ने लज्जा से अवनत होते हुए विनम्र होकर उनके चरणों में प्रणाम
किया था। इसके अनन्तर महादेवजी ने उस व्रत के धारण करने वाली
सती से कहा था। शिव स्वयं भार्या के लिए उसकी इच्छा करने वाले
होते हुए भी उसके आश्चर्य के फल के प्रदान कराने वाले हुए थे।
ईश्वर ने कहा-हे दक्ष की पुत्री! आपके इस व्रत से मैं परम प्रसन्न हो
गया हूँ। अब आप वरदान का वरण कर लो जो भी आपको अभिमत
होवे। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-जगत् के स्वामी महादेव उसके भाव को
जानते हुए उस सती के वचनों के श्रवण करने की इच्छा से 'वरदान
माँग लो' यह बोले थे। वह सती भी लज्जा से समाविष्टा होती हुई जो
कुछ भी हृदय में स्थित था उसके कहने में समर्थ न हो सकी थी क्योंकि
बाला को जो भी मनोरथ अभीष्ट था वह लज्जा से समाच्छादित हो
गया था अर्थात् लज्जावश उस अभीप्सित को मन में ही रखकर कुछ
भी न बोल सकी थीं।