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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

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DevanagariSanskritpublished442 pages

Page 438 of 442

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Page 438

४४२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
भावार्थ-तुम सुरापान से मस्त रहती हो तथा अपने भक्तों पर कृपा
बिखेरती हो, जप-ध्यान-पूजा रूपी अमृत से निर्मल तथा पवित्र हृदय से
तुम्हारा अविर्भाव सुशोभित होता है। तुम्हारे इस स्वरूप को देखता भी नहीं
जानते हैं ॥४॥
चिदानन्दकन्दं हंसन्मन्दमन्दं,
शरच्चन्द्र कोटिप्रभापुञ्जबिम्बम्।
मुनीनां कवीनां हृदि द्योतमानं,
स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥५॥
भावार्थ-तुम चिदानन्द की मूल, मन्द-मन्द मुस्काने वाली, करोड़ों
शरद् चन्द्रमाओं की प्रभा से युक्त मुख वाली एवं मुनियों तथा कवियों के
हृदय को प्रकाशित करने वाली हो। तुम्हारे इस स्वरूप को देवता भी नहीं
जानते हैं।
महामेघकाली सुरक्ताऽपि शुभ्रा,
कदाचिद्विचित्रा कृतिर्योगमाया।
न बाला न वृद्धा न कामातुराऽपि,
स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥६॥
भावार्थ-तुम महामेघों के समान कृष्णवर्णा, रक्तवर्णा तथा शुभ्रवर्णा भी
हो। तुम कभी-कभी विचित्र आकृति को धारण करने वाली योगमाया हो।
तुम न बाला हो, न वृद्धा हो और न कामातुरा हो। तुम्हारे स्वरूप को देवता
भी नहीं जानते हैं ॥६॥
क्षमास्वापराधं महागुप्तभावं,
मयालोकमध्ये प्रकाशीकृतं यत्।
तव ध्यानपूतेन चापल्यभावात्,
स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥७॥
भावार्थ-मैंने तुम्हारे ध्यान से पवित्र चापल्यभाव से तुम्हारे अत्यन्त गुप्त
भाव को जो संसार में प्रकट कर दिया है, उस अपराध के लिए तुम मुझे
क्षमा करो। तुम्हारे इस स्वरूप को देखता भी नहीं जानते हैं ॥७॥