Skip to content
SarvaKosh
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

Page 435 of 442

Read in context
Page 435

൵ श्रीकालिका पुराण ൴ ४३९
मुक्तकेशी—काली के बाल बिखरे हुए हैं—इसका आशय यह है कि
भगवती केश-विन्यास आदि विलास के विकारों से मुक्त हैं ।
त्रिनेत्रा—इसका अर्थ है कि सूर्य, चन्द्र और अग्नि ये तीनों ही भगवती
के नेत्र स्वरूप हैं । अथवा भगवती तीनों कालों भूत, भविष्य तथा वर्तमान
को जाननेवाली हैं ।
बालावतंसा—काली ने अपने कानों में बालक का शव पहना है ।
इसका मतलब है कि वे बालस्वरूप निर्विकार साधक को अपने कानों के
पास रखती हैं या बालक के समान सच्चे साधक के समीप ही उनके कान
रहते हैं ।
प्रकटितरदना—श्री काली के दाँत-बाहर निकले हैं और वे उनसे बाहर
निकली जीभ को दबाये हैं । इसका आशय है कि भगवती रजोगुण तथा
तमोगुण रूपी जीभ को सत्वगुण रूपी उज्ज्वलता से दबाये हुए हैं ।
पीनपयोधरा—श्रीकाली के स्तन बड़े तथा उन्नत हैं—अर्थात् भगवती
अपने स्तनों से तीनों लोकों को अमृतमय दूध रूपी आहार देकर उनका पालन
करती हैं यानी वे अपने साधकों को अमरत्वरूपी दूध पान कराती हैं ।
चिर यौवना—इसका आशय है कि देवी में अवस्था (उम्र) सम्बन्धी
कोई परिवर्तन नहीं होता । वे सदा युवावस्था में रहती हैं, वे अपरिवर्तनशीला
हैं ।
करालवदना—काली का रूप भयानक काला है । इसका आशय है कि
देवी का स्वरूप देखकर सामान्यजन भयभीत होते हैं । लेकिन जिनके
चित्त में देवी का वास है या जो माँ काली के भक्त हैं, उन्हें डरने का कोई
कारण नहीं । क्योंकि माँ काली के भक्तों से काल (यम) भी भयभीत
रहता है ।