कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in context४०८ श्रीकालिका पुराण
आभूषणों के नाम व प्रकार आदि
भूषण बताये जाते हैं, किरीट शिरोरत्न, कुण्डल, ललाटिक, ताल
पत्र, हार, ग्रैवैषक, उर्मिका, प्रालम्बिका, रत्न सूत्र, उत्तुंग, तक्ष मालिका,
पार्श्वद्योत, नखद्योत, अंगुलीच्छादक, अंगद, बाहुवलय, शिखाभूषण,
इंगिका, प्राग्दण्वन्ध, नीवी, मुष्टिबन्ध, प्रकीर्णक, पादांद, हंसक,
भूपुर, क्षुद्रघण्टीका, मुखपट्ट, ये परम सुशोभन अलंकार कहे गए हैं।
ये कुल चालीस होते हैं जो देवलोक में सौम्य के प्रदान करने वाले हैं।
अलंकारों के प्रदान करने से चारों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) वर्गों का
प्रसाधन होता है। इसका पूजन करके ही इष्ट की सिद्धि के लिए
समर्पण करना चाहिए। विचक्षण पुरुष को उनके दैवत का उच्चारण
करके ही पूजन करना चाहिए। अथवा शिरोगतं सौवर्णों को सर्वदा
समर्पित करना चाहिए।
हे भैरव! चूड़ारत्न आदि भूषण ग्रैवेयक से आदि लेकर हंस के
अन्त तक सब सुवर्ण से निर्मित हों अथवा रजत (चाँदी) से रचित होने
चाहिए। इन्हीं को देवताओं के लिए समर्पित करना चाहिए और अन्य
तेजस अर्थात् धातुओं से विरचितों को निवेदित नहीं करना चाहिए।
रीति रंग आदि से निर्मित पात्र और उपकरण आदि ही होने चाहिए।
इन भूषणों की बीच में इससे उपभूषण देवे। सब ताम्रमय जो कुछ भी
भूषण आदि हैं उन्हें निवेदित करे। सर्वत्र ताम्र आभूषण भी स्वर्ण की
ही तरह से दे और अर्घ्य पात्र में अधिक देना चाहिए। पूजा का अर्घ्य
पात्र, नैवेद्य का आधार पात्र, पालक है। भगवान् विष्णु के लिए सदा
उदुम्बर (गूलर वृक्ष) से निर्मित प्रीति तथा सन्तोष देने वाले होते हैं।
ताम्रपात्र में देवगण प्रसन्न हुआ करते हैं क्योंकि ताम्र में देव सदा स्थित
रहा करते हैं। ताम्र सबके लिए प्रीति का करने वाला हुआ करता है।
अतएव ताम्र का प्रयोग करना चाहिए। हे भैरव! अपने उपयोग में भी
ताम्र का ही प्रयोग करे और देवगणों के भी उपयोग में इसका प्रयोग
करना चाहिए। ग्रीवा के ऊपर के भाग में कभी भी रौप्य (चाँदी का
भूषण का प्रयोग न करे)।