कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in context४०४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
नहीं ग्रहण करना चाहिए जो पूर्व में कहा गया है तथा गन्ध मृग के चर्म
का आसन ले । यदि जल में देवताओं का पूजन करे वहाँ पर भी
आसन पर बैठे हुए साधक को कभी उठना नहीं चाहिए । जल में
शिलामय अथवा कुशा का ही आसन करे । काष्ठ का अथवा तैजस
अर्थात् धातु निर्मित आसन को ग्रहण करे तथा अन्य आसन को
समाचरित नहीं करे । स्थान के अभाव में तो पूजन आसन के आरोप
में संस्थान को ही आसन कल्पित करके मन से जल में पूजन करें ॥ यदि
जल के मध्य में बैठने का संस्थान नहीं दे तो अन्य स्थान में बैठकर उस
समय में देव की पूजा का समाचरण करना चाहिए । हे पुत्र! यही
आपको मैंने पूज्य का जो संगत विषय है वह कहकर बता दिया है ।
हे बेताल भैरव! आसन और इससे पाद्य का श्रवण कीजिए । चरणों
के प्रक्षालन के लिए जो जल है वही पाद्य होता है अथवा केवल वह
जल ही होता है । वह पाद्य किसी उत्तम धातु से निर्मित पात्र के द्वारा
और शंख के द्वारा भी देना चाहिए । पाद्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष
का संस्थान होता है ।
उस समय में आसन के उत्तर में सभी ओर से मूल मन्त्र के द्वारा
कुश, पुष्प, अक्षत, सिद्धान्त, चन्दन तथा यथालभ्य अर्थात् जो भी
प्राप्त हो सकें जलों से सिद्धि के लिए अर्घ्य देना चाहिए । अर्घ्य से
कामनाओं का लाभ होता है और अर्घ्य देने से धन की प्राप्ति हुआ
करती है । अर्घ्य से पुत्र, आयु, सुख, मोक्ष की प्राप्ति हुआ करती ।
विचक्षण पुरुष को कभी शंख के द्वारा जल का अर्घ्य भास्कर के लिए
नहीं देना चाहिए । सीप के पात्र से भगवान् विष्णु के लिए अर्घ्य
निवेदित नहीं करे । सुगन्ध से युक्त जल से ही जो परम शुभ हो
आचमनीय समर्पित करे । कर्पूर के वासित और कृष्ण गुरु से धूपित
जिस प्रकार से सुगन्धित हों । वैसे ही प्रसंगों से और फेनों से रहित जल
से तैजस ( धातु निर्मित ) पात्र के द्वारा और शंख के द्वारा भी निवेदित
करे । जो भी जल दिया जाता है वह स्वच्छ और फेनों रहित ही होना
चाहिए । देवों के लिए जो आचमन करने को जल दिया जाता है वही