Skip to content
SarvaKosh
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

Page 397 of 442

Read in context
Page 397

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ४०१
गाण्डीव धनुष जो देवों द्वारा निर्मित और वारुण था, प्रदान किया था
और अक्षय, दिव्य औषधियाँ दी थीं और सुरूप से संयुत चार अश्व,
हनुमानजी से अधिष्ठित वानर ध्वजा वाला महान् रथ, खंड, वीक्षण
त्रिशिख अग्नि से सव्यसाची (अर्जुन) को दिए थे । तथा विष्णु के
प्रसाद से वह्नि रोग से रहित हो गया था । फाल्गुन (अर्जुन) ने उन
बाणों से, उस धनुष से, खंड से, केतु से उन अश्वों वाले रथ से शत्रुओं
पर विजय प्राप्त की थी । इस प्रकार से भैरव के वंशों में विजय नृप
जो महाआकृति वाला था उसने खाण्डव को विपिन कर दिया था ।
विजय राजा के महान् बल वाले तेरह पुत्र हुए थे । उनके नाम
द्युतिमान, सौम्यदर्शी, भूरि, प्रद्युम्न, ऋतु-पुण्य, विरुपाक्ष, विक्रान्त,
धनञ्जय, प्रहर्ष, प्रबल, केतु और उपरिधर थे ।
इन सबका राजा वीर हुआ था जो शेषोपरिचर था जिसने
वाराणसी नगरी में पहले एक लाख यज्ञ किए थे । एक लाख यज्ञों के
करने वाला कोई भी नहीं हुआ था और न भविष्य में भी होगा । इसके
पुत्र, पौत्र, प्रपौत्रों से ही यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है । भूमण्डल में ऐसा
कौन-सा मनुष्य है जो बहुत लम्बे समय में भी उनकी गिनती कर सकता
हो । अर्थात् ऐसा कोई भी मनुष्य नहीं है । क्रम से भैरव के वंश से यह
तीनों लोक व्याप्त हो रहे हैं । हे विप्रों! यह मैंने आपके समक्ष में भैरव
की सन्तति का वर्णन कर दिया है । जो एकाग्र मन से उत्तम चरित्र का
श्रवण करता है उसके वंश का विच्छेद कभी भी नहीं हुआ करता है
और न होगा ही ।
श्री भगवान ने कहा-हे भैरव मैं अब सोलह उपचारों का वर्णन
करता हूँ । उनका आप श्रवण कीजिए । जिनसे देवी भली भाँति से
सन्तुष्ट हुआ करती है और अन्यदेव भी परम प्रसन्न होते हैं । सबसे
प्रथम आसन देना चाहिए । यह आसन या कौश हो । उसे खण्डल के
उत्तर की ओर ही सृजन करना चाहिए । जिस समय में यह पद्य में दिया
जाता है उसे मण्डल के उत्तर में ही देवे । अर्घ्य, पाद्य, आचमन,
स्थानीय, नेत्ररञ्जन, मधुपर्क, गन्ध और पुष्प निवेदित करे । और