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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

Page 389 of 442

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Page 389

३९२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- नन्दी के वचन का श्रवण करके वे दोनों
ही प्रसन्न मन वाले हो गए थे । इसके अनन्तर निरन्तर अपने हृदय में
नन्दी के वचन को स्थिर करके वे दोनों ही इधर-उधर गमन करते हुए
अपने पुत्रों के समुत्पन्न के लिए चेष्टा करने लगे थे । एक समय में इस
भैरव ने हिमवान् पर्वत के प्रस्थ में परम सुन्दरी और श्रेष्ठ उर्वशी
अप्सरा को देखा था । इसके उपरान्त परम कामुक होकर इसने उर्वशी
से सुरतोत्सव की याचना की थी । वेश्या के भाव से परम प्रसन्न होती
हुई उसने यथेच्छा कहा था । इसके अनन्तर भैरव ने उसके साथ
सुरतोत्सव की क्रीड़ा की थी और वह प्रसन्न हुई उर्वशी में भैरव के तेज
से सूर्य वाला सूर्य के समान प्रभा वाले सद्योजात पुत्र ने जन्म ग्रहण
किया । उस पुत्र का परित्याग करके उर्वशी अपने स्थान को चली गयी थी ।
भैरव ने बहुत ही आनन्द से युक्त हो उस पुत्र का संस्कार कर
गणधियों सहित करके उसका नाम उसने सुवेश रखा था । इसके
अनन्तर उचित अवस्था के प्राप्त करने वाले और इन्द्र तथा सूर्य के तुल्य
कान्ति से संयुत उस सुवेश का विद्याधरों के अधिपत्य में अभिषेक कर
दिया था । उसने विद्याधरों के अध्यक्ष की अत्यन्त सुन्दरी पुत्री के साथ
विवाह कर लिया था जो कि गन्धर्वों का राजा और धृतराष्ट्र नाम वाला
था । उसमें परम सुन्दर रूरू नाम वाले पुत्र ने जन्म ग्रहण किया था ।
रुरु के पुत्र बाहु ने मैनाकी में जन्म लिया था । बाहु के चार पुत्र उत्पन्न
हुए थे जिनके नाम तपन, अंगद, ईश्वर और कुमुद थे । कुमुद सबसे
छोटा था । कुमुद का पुत्र परम सुन्दर पार्वती में उत्पन्न हुआ था जो
महान् बलवान् देवसेन नाम वाला था । वह परम मनोहर देवसेन पृथिवी
पर अवतीर्ण हुआ था । कोमल अंगों वाली अप्सरा यौवनाश्रव की
केशिनी नाम वाली पुत्री का जो बहुत ही कोमल अंगों वाली अप्सरा
के समान थी अपनी भार्या बनाने के लिए वरण किया था ।
यौवनाश्रव मान्धाता ने भी इन्द्र के वचन से अपनी पुत्री केशनी की
इच्छा से ही देवसेन के लिए प्रदान कर दिया था । देवसेन ने केशिनी
के साथ विवाह करके उसी को साथ में लेकर उसने शम्भु की पुरी