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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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३८४ ६००३ श्रीकालिका पुराण ६००३
राजन् ! आपकी सेवा में नमस्कार समर्पित हैं । इस रीति से उत्तम तन्त्रों
में वर्णित दहन और पावन के आदि के द्वारा इस मन्त्र से और तन्त्र से
तथा अनेक नैवेद्यों के निवेदनों से, अपूपों से, पायस से, पान, गुड़ और
अनेक तरह के भक्ष्यों से, भोज्यों से श्री की विशेष वृद्धि के लिए पूजा
करनी चाहिए ।
घट दिक्पालों को और ग्रहों का अर्चन करे । अनुक्रम से साध्य
आदि समस्त देवों का और सब मातृकाओं का पूजन करना चाहिए ।
इसके अनन्तर किसी शुभ मुहूर्त में वर्धकि से समन्वित ज्ञानी यज्ञवेदी के
पश्चिम में केतूत्थापन की भूमि में विप्रों और पुरोहितों के साथ राजा
गमन करे । सुमंगल पाँच रज्जुओ से सुबुद्ध मन्त्र से श्लिष्टा मातृकाओं
के सहित, कुमारियों से संयुक्त और दिक्पालों के पादकों युत, वृहन्,
अतिकान्त सुपूरित अनेक द्रव्यों से यथावर्ण और यथादेश में वस्त्र से
वेष्टित किए हुए हैं । योजिंतों से युक्त उसको जो किंकिणी के जलों
से तथा बड़े घण्टाओं से और चामरों से भूषित तथा रत्नों की माला से
अलंकृत अद्भुत माल्यों और अम्बरों से तथा चारों तोरणों से राजकीयों
के द्वारा धीरे-धीरे महाकेतु को उत्थाथित करे । मण्डल में पूजित उस
महाकेतु को उठाकर इन्द्रदेव का चिन्तन करते हुए उस प्रतिमा को केतु
के मूल में ले जावे ।
वहाँ पर पूर्व की ही भाँति उसका यजन करे तथा शची माताल,
उसके पुत्र जयन्त और ऐरावत का भी अर्चन करना चाहिए । ग्रहों,
दिक्पालों, सर्पों, गणदेवों अश्वों, वलियों के द्वारा और पायस आदि से
पूजन करना चाहिए । अर्चन किए हुए देवों को निरन्तर होम का
समाचरण करे । होम के अन्त में बलि देवे जो महात्मा वासव के लिए
देनी चाहिए । हे नरोत्तम! तिल, घृत, अक्षत, पुष्प, दूर्वा, इनके द्वारा
अपने-अपने मन्त्रों से देवों का हवन करना चाहिए । इसके उपरान्त होम
के अन्त में ब्राह्मणों को भोजन करावे । इस रीति से सात रात्रि पर्यन्त
दिन-दिन में नित्य भली भाँति अर्चन करना चाहिए । देवों और वेदांग
शास्त्रों के पारगामी विद्वान ब्राह्मणों के सहित राजा सर्वत्र इन्द्र की पूजा