कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in contextलिए ही किया था। राम और रावण से जो युद्ध हुआ था वह देखकर
भय देने वाला हुआ था। तृतीया से लंका से पूर्वोत्तर दिशा में स्थित
स्वाति नक्षत्र से युक्त में सुरों का बल बहुत अधिक भयभीत हो गया
था। देवेन्द्र ने हरि के वचन से शान्ति के लिए वारण किया था। इसके
अनन्तर श्रवण नक्षत्र से संयुत दशमी में शुभ चण्डिका को विदा करके
हरि ने शान्ति स्थापित करने के लिए बल का नीराजन (आरती) किया
था। जिसके बल का नीराजन किया था वह इन्द्रदेव वहाँ पर श्रीराम
रावण को संस्थापित करके देवों सहित अपने स्वर्ग लोक को चला
गया था। पहले कल्प में यह इति वृत्ति है जो कि स्वायम्भुव मन्वन्तर
में था। उस समय में दश भुजाओं वाली देवी देवों के हित का सम्पादन
करने के लिए प्रादुर्भूत हुई थी। त्रेता युग के आदि काल में हित का
सम्पादन करने के लिए प्रादुर्भूत हुई थी। त्रेता युग के आदि काल में
मनुष्यों के जगतों की जनता के हित की कामना से पहले काल में जो
हुआ था वैसा ही प्रत्येक कल्प में हुआ था। देवी स्वयं दैत्यों के विनाश
करने के लिए प्रवृत्त होती है। प्रत्येक काल में श्रीराम होते हैं और
राक्षसराज रावण भी हुआ करता है। उसी प्रकार युद्ध होता है और
उसी भाँति देवों का संगम भी होता है। इस प्रकार से सहस्त्रों ही श्रीराम
के अवतार हुआ करते हैं और रावण भी सहस्त्रों की संख्या में होते हैं।
प्राणी भी जो होने वाले हैं वे होते हैं और वैसे ही देवी भी प्रवृत्त हुआ
करती है। सभी सुरगण उस देवी का पूजन किया करते हैं तथा
नीराजन भी करते हैं।
उसी भाँति जैसा कल्प में करते थे सभी मनुष्य विधि विधान के
साथ पूजा किया करते हैं। राजा बल का नीराजन बल की वृद्धि के
लिए किया करता है। दिव्य अलंकारों से युक्त वारुणी से प्रवृत्तन होता
है। उस समय में क्रीड़ा कौतुकों के द्वारा मंगलमय नृत्य और गीत करने
के भक्ष्यों तथा भोज्यों से, कूष्माण्ड, नारिकेल, खर्जूर, पनस, हास,
आँवला, शांडिल, प्लीह, करुण, कशेरु, क्रमुक, मूल, जम्बू, तिन्दक
तथा गुड़, माँस, मद्य, मधुताल, प्रिय नैवेद्य लाजा (खील), अक्षत,