कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in contextन्यून है और मध्य है। सत्व, रज और तमोगुण इनके विकारों से आप
हीन हैं और जो साम्बस्थिति रूपा हैं। वह आप गुणों की हेतु हैं, बाहर
और अन्तराल में भवती की भाँति गमन किया करती हैं। हे अशेष
जगतों की पीजे ! हे ज्ञेय (जानने के योग्य) और ज्ञान के स्वरूप वाली !
हे जगतों की विष्णु माये ! जगत् की हित स्वरूपा आपके लिए नमस्कार
है। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- उनके इस वचन को सुनकर लोकों के
विमोहन करने वाली काली ने मेघ की गर्जना के समान अर्थात् गम्भीर
ध्वनि से जगतों के सृजन करने वाले ब्रह्माजी से बोली। देवी ने
पूछा- हे ब्राह्मण ! आपने किस प्रयोजन का सम्पादन करने के लिए मेरी
स्तुति की है। इसका अवधारण करो और बतलाओ जो भी मनोभाव
होवे, यह मेरे सामने शीघ्र ही कहो। मेरे प्रत्यक्ष हो जाने पर कार्य की
सिद्धि निश्चय ही होती है। इस कारण से आप अपना जो मनोऽभिलाषित
हो उसे शीघ्र ही कहो जिसको मैं भावित कर दूँगी।
ब्रह्माजी ने कहा- भूतों के ईश भगवान् शम्भु एक ही अर्थात्
अकेले ही विचरण किया करते हैं और दूसरी की इच्छा ही नहीं रखते
हैं। आप उनको मोहित कर दो और वह स्वयं ही दारा ग्रहण कर लेवें।
आपके बिना अर्थात् आपको छोड़कर उनके मन को हरण करने वाली
कोई भी नहीं होगी। इस कारण से आप ही एक स्वरूप से भगवान्
शम्भु का मोहन करने वाली हो जाओ। जिस प्रकार से आप लक्ष्मी के
स्वरूप से शरीर धारण करने वाली होकर भगवान् केशव को अमोदित
किया करती हैं। विश्व के हित सम्पादन करने के लिए उसी भाँति
इनको करिए। वृषभध्वज शम्भु मेरी कान्ता की अभिलाषा मात्र को ही
बुरा कहते थे अतः किस-किस रीति से वे वनिता को अपनी ही इच्छा
से ग्रहण करेंगे। कान्ता के ग्रहण न करने वाले हर के होने पर यह
सृष्टि कैसे प्रवृत्त होगी ? आदि, अन्त और मध्य के हेतु स्वरूप उन
शम्भु के विरागी होने पर यह कैसे हो सकेगा ? इस चिन्ता में गमन मैं
हूँ, आपसे अन्य मेरा यहाँ पर रक्षक कोई नहीं हैं। अतएव विश्व की
भलाई के लिए आप यह करिए जो कि मेरा ही कार्य है। इनके मोह