कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in context३०६ श्रीकालिका पुराण
मनुष्य सूतक में तथा मृतक में नित्य कर्म करो । पुत्र, पुष्प, फल और
जल, ताम्बूल भोजन के ही रूप में माना गया है ।
कण से लेकर पिप्पली के पर्यन्त, हे नर श्रेष्ठ! भेषज के बिना जल
के भी भोजन से और फल खाकर समाचरण नहीं करे । सदा नैमित्तक
कर्मों के साथ नित्य क्रिया को निवर्त्तित करे । जलों का, गूढ़ पाद,
कृमि, अण्ड के पदादिक को काम से हाथ के द्वारा सम्पर्क करके नित्य
कर्मों का त्याग कर देना चाहिए । जब तक एक वर्ष हो उसके अन्त
तक मन से भी आचरण न करे । महागुरु के निपात हो जाने पर कुछ
भी काम्य कर्म का समाचरण नहीं करना चाहिए । आर्त्त्विज्य, ब्रह्म
यज्ञ, श्राद्ध, देव यज्ञ गुरु का और विप्र का आक्षेप करके और हाथ
से प्रहृत करके, हे भैरव! रेतस के पात हो जाने पर नित्य कर्मों को नहीं
करना चाहिए । आसन और अर्घ्य पात्र के भग्न हो जाने पर आसादित
नहीं करना चाहिए ।
ऊसर में कृमियों से संयुत होने पर उसको भ्रष्ट करके भी वहाँ पर
अर्चन नहीं करना चाहिए । नीचे स्थान पर आसन रख कर शुचि और
संयत मन वाला होकर ही, हे भैरव! चण्डिका देवी तथा अन्य देव का
अर्चन नहीं करना चाहिए । दिशाओं के विभाग में कोवेरी दिशा शिवा
की प्रीति के देने वाली हुआ करती है । इस कारण से उस देवी के
सम्मुख में ही स्थित होकर सदा ही चण्डिका का अभ्यर्चन करना
चाहिए । पुष्प भी ऐसा होना चाहिए जो कृमियों से समिश्रित न होवे,
विशीर्ण, भग्न और मिट्टी में पड़ा हुआ नहीं होवे । जो पुष्प चूहों से
उद्भूत हो और केशों से युक्त हो उनका परिवर्जन रत्नपूर्वक कर देना
चाहिए । पाचना किया हुआ, दूसरे का तथा पर्युषित (बासी) अत्यन्त
मृष्ट, पैर से स्पर्श किया हुआ हो तो ऐसे पुष्प को वर्जित कर देना
चाहिए अर्थात् पूजा के कर्म में कभी ग्रहण नहीं करे । यह शिव का
परमाधिक मनोहर विधान है इसको जो भी साधक उसके पूजन में
किया करता है वह अपना अभीष्ट प्राप्त करके, हे भैरव! शीघ्र ही
चण्डिका देवी के गृह में प्रयाण करने वाला होता है ।