Skip to content
SarvaKosh
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

Page 294 of 442

Read in context
Page 294

२९६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ

हृदय को निश्चल आकाश में देकर स्वप्न का निक्षेप करे ।
“ॐ हूँ फट्”-इस मन्त्र के द्वारा मस्तक में रन्ध्र का भेदन करके
शब्द के सहित जीव को आकाश में स्थापित करे । वायु, अग्नि, यम
इन्द्रों का और बीज के द्वारा शेषादि करे । ये परास्थान पर हैं,
बिन्दु और अर्द्धचन्द्र के सहित इनसे शेष-दाह तथा उच्छद, परपीयूष
का आसेवन यथाक्रम से करना चाहिए । विशुद्ध के लिए चिन्तन मात्र
की है ।
इसके अनन्तर देवी के बीज के द्वारा जाम्बूनद की आकृति वाले
अण्ड का पूजन करे । वहाँ पर पहुँचकर ‘ॐ ह्रीं श्रीं' मन्त्रों से द्विधा
करना चाहिए । उनके ऊर्ध्व भागों में हृदलोक, स्वर्ग को भूमि तथा
आकाश का निष्पादन करके शेष भाग से भू को पाताल के जल में
चिन्तन करे । वहाँ पर सबका चिन्तन करना चाहिए । उसके मध्य में
रत्नों से निर्मित मण्डल में संस्थित रत्न पर्यंक का चिन्तन करे ।
आकाश गंगा के जल की राशि से सदा ही सेवित वह शुभ है ।
उस पर्यंक पर रक्त पद्म है जो प्रसन्न और सर्वदा शिव है । उसका
ऐसा चिन्तन करे कि वह स्वर्ण मानांक है, सप्त पातालों का नाम वाला
हैं, ब्रह्मलोक से लेकर भुवन का स्पर्श करने वाला है तथा सुवर्णाचल
के कर्णिका वाला है । वहाँ पर स्थित महामाया का एकाग्रमन वाला
होकर ध्यान करे । वह महामाया शोण पद्म के सदृश है और उसके
केश खुले हुए रहकर लटके हुए हैं । वह चलत्कांचना पर समारूढ़
तथा उज्जवल कुण्डलों की शोभा वाली है । सुवर्ण और रत्नों से सम्पन्न
दो किरीटों को धारण करने वाली है ।
शुक्ल, कृष्ण और अरुण वर्णों वाले तीन नेत्रों द्वारा बहुत ही
सुन्दर विभूषित है । सन्ध्याकालीन चन्द्र के तुल्य कपोलों से संयुक्त हैं
और उनके लोचन चंचल है । पंकरहित दाड़िम के बीजों के समान
दाँतों के रखने वाली, सुन्दर भौंहों से योग से उज्जवल, बन्धूक दन्त के
वसनों वाली, शिरीष की प्रभा से युक्त, नासिका से संयुत, कम्बु के
सदृश ग्रीवा वाली, विशाल नेत्रों से युक्त, करोड़ों सूर्यों की प्रभा से