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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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Page 286

२८८ ❧ श्रीकालिका पुराण ❧
होते हुए जप करके शीघ्र ही सिद्धि की प्राप्ति कर लोगे । यह आप
दोनों को मन्त्र बतला दिया है तथा इनका ध्यान और पूजा का क्रम भी
कह दिया गया है । अब आप लोग नाटक पर्वत पर जाइए और वहाँ
पर भगवान् हर की आराधना करिए । वेताल और भैरव दोनों ने
कहा-हे मुनिवर! यह पाँच अक्षरों वाला मन्त्र आपकी सम्मति से धारण
कर लिया और इसी मन्त्र के द्वारा देवेश्वर शम्भु का आनन्द के साथ
हम यजन करेंगे । हे नृप! इतना ही यह कहकर तथा वेताल और भैरव
दोनों ने प्रणाम किया था और फिर वशिष्ठ मुनि की अनुमति से नाटक
पर्वत पर वे दोनों चले गए थे । वहाँ पर एक परमसुन्दर सरोवर था
जिसकी सुन्दरता मन को हरण करने वाली थी । उसमें सर्वदा बहुत ही
स्वच्छ जल रहा करता था और सदा विकसित कमल रहते थे ।
उसी सरोवर के तट पर परम विशाल और अत्यधिक सुन्दर
भगवान् शम्भु का आश्रम था । वह आश्रम सर्वदा दानवों, देवों, किन्नरों
तथा प्रमथों द्वारा हे नृप शार्दूल! रक्षा किया जाता है । वे रक्षा करने
वाले सदा ही नृत्य और वादन में परायण रहा करते हैं । जिस कारण
से वहाँ पर ईश कौतुक में तत्पर होकर नित्य नटित हुआ करते हैं । इसी
कारण से यह पर्वत इस नाम से जाना जाता है । वह शैलछत्र के
आकार के तुल्य आकार वाला था, परम मनोज्ञ था और भगवान शंकर
का अतीव प्रिय था । जहाँ पर सरोवर की प्राप्ति की थी । उस समय
इन दोनों ने वहाँ पर गमन किया था और उन्होंने परमोत्तम भगवान् हर
का आश्रम नहीं देखा था । हे नृप! वे दोनों आश्रम के स्थान पर गमन
करने में असमर्थ हो गए थे । इसके अनन्तर उन्होंने भगवान शम्भु को
प्रणाम किया था और सरोवर के तट पर स्थित हो गए थे । वहीं पर
वशिष्ठ मुनि के द्वारा कथित क्रम से एक सुन्दर स्थण्डिल का निर्माण
करके वेताल और भैरव दोनों ने भगवान हर की आराधना करना
आरम्भ कर दिया था । उस समय में शंकर के आत्मज उन दोनों को
जो कि भूतेश्वर की आराधना कर रहे थे, भगवान् शंकर ने उस पर्वत
पर देवगणों के साथ देखकर उस पर्वत की उपत्यका में अपर्णा के साथ