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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

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DevanagariSanskritpublished442 pages

Page 275 of 442

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Page 275

दान दिया जिसमें बहुत धन रत्न थे तथा अधिक आसन और रथ थे।
भाग के द्वारा उतना धन, रत्न आदि दास व वित्त उन दोनों के लिए
नहीं दिए थे जो कि भैरव के लिए थे। इसके अनन्तर उन दोनों में क्रोध
ने प्रवेश कर लिया था वे दोनों की क्रोध से अभिभूत हो गये और दोनों
इधर-उधर विचरण करने लग गये। उन दोनों वीरों ने भोगों से उपभोग
करने की इच्छा ही नहीं की और तपश्चर्या का समाचरण करने के
लिए उद्यत हो गये। उन दोनों ने किसी भार्या से विवाह नहीं किया था
अर्थात् वे दोनों अविवाहित थे तथा निरन्तर सदा ही निर्जन वन में वास
किया करते थे।
उस काल में देव वेताल और भैरव पुत्रों को उस प्रकार से रहने
वाले हैं, ऐसा ज्ञान था उस समय में देवी तारावती चिन्ता से समाक्रान्त
हो गयी थीं अर्थात् उसे बहुत अधिक चिन्ता समुत्पन्न हो गई थी। वह
उपरिचर राजा से और अपने पति चन्द्रशेखर से भयभीत हो गई थी।
वह सुन्दरी गुप्त रूप से दोनों का ज्ञान रखती हुई भी कुछ भी नहीं
बोली थी। इसी बीच मुनियों में परम श्रेष्ठ और विद्वान कपोत
चित्रांगदा के साथ सम्भोग और सुरतोत्सवों के द्वारा परम संतुष्ट होकर
उस सहचारिणी एवं पुत्रों से युक्त चित्रांगदा का परित्याग करके उसने
वहाँ से गमन करने की इच्छा की थी और उस अवसर पर उसने
चित्रांगदा से यह वचन कहा था। मुनि ने कहा- चित्रांगदे! मैं तपस्या
का समाचरण करने के लिए अब तपोवन में गमन करूँगा। वहाँ पर
मैं तेरा क्या प्रिय कार्य करूँ ? हे मनोहर! उसी को मुझे तुम बतला दो।
चित्रांगदा ने कहा- हे सुव्रत! तुम्परु और सुवर्चा ये दो आपके पुत्र हैं।
मुनिश्रेष्ठ! आप इन दोनों का जो भी उचित हो वह प्रिय करो। हे द्विज
श्रेष्ठ! मुझको भी मेरी भागिनि के घर में संस्थापित करके, हे अनघ!
आपको यदि रुचता है तो सभी आप तपोवन में गमन करिये।
मुनिश्रेष्ठ कपोत यह उसके वचन का श्रवण करके भली भाँति
विचार करके हिरण्य (सुवर्ण) के लिए कुबेर के भवन में गये थे।
उसने कुबेर से छः सौ सहस्त्र सुवर्ण के निष्कों की प्रार्थना की थी और