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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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Page 252

२५४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
गुच्छों से भूषित हो गये थे। अशोक, पाटल और नागकेशर सभी
विकार से समन्वित थे।
हे द्विजो! भगवान् शम्भु के गण भी प्रत्यक्ष में विकार वाले हो गये
थे किन्तु शम्भु के भय से इधर-उधर भ्रमण कर रहे थे। उस अवसर
पर वहाँ भ्रमर कुसुमों से अद्भुत रस का पान करते हुए गुञ्जार करने
वाले थे। इस प्रकार से सुरभि के प्रवृत्त हो जाने पर श्रृंगार ने अपने
गणों के साथ हाव-भावों से संयुत होकर हर के समीप प्रवेश किया
था। वहाँ पर कामदेव तो अपने गणों के सहित चिरकाल तक निवास
करने वाला हो गया था। उस समय कोई भी ऐसा छिद्र शम्भू में नहीं
देखा था जिससे वह उस समय में वह भय से विमोहित हो गया था।
मदन आगे गमन करने वाला नहीं हुआ था क्योंकि रति के द्वारा वह
वारित कर दिया गया था। हे द्विजसत्तमो! इस प्रकार उसको बहुत सा
समय व्यतीत हो गया था। उस समय उन यति शम्भू में उसने कोई भी
छिद्र नहीं प्राप्त किया। प्रज्वलित अग्नि सदृश और लाखों सूर्यों के
समान प्रभा वाले ध्यान में स्थित भगवान् शंकर के पास पहुँचने के
लिए कौन समर्थ था अर्थात् किसी की भी ऐसी शक्ति नहीं थी।
इसके अनन्तर एक बार गिरि की पुत्री काली उनके सामने हुई थी
जो करने के योग्य सेवा थी उसे करके वह सखियों के साथ प्रणत
होकर स्थित हो गई थी। भगवान् शंकर भी अपने ध्यान का त्याग
करके उसी क्षण समास्थित हुए थे। कृत्य में अपने गणों को योजित
करते हुए वे ज्योतिस्वरूप चिन्ता से रहित थे। कामदेव ने वहीं छिद्र
प्राप्त करके सबसे प्रथम हर्षण बाण के द्वारा पार्श्व शम्भु को हर्षित
किया था और शृंगार सुरभि के साथ में कामदेव की सहायता कर रहा
था। हर्षिणी बाण के द्वारा वे अति हर्षित होते हुए शृंगार आदि के
द्वारा निषेवित हुए थे। भगवान् शंकर ने विशेष अभिप्राय के सहित
काली के मुख को अच्छी तरह से अवलोकन किया था। कामदेव ने
उसी छिद्र को प्राप्त करके पुष्प को चाप में नियोजित किया था। पुष्प
से वृत तथा पुष्पमाला सहित सम्मोहन को छोड़ा था। उस समय उसके