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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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80 श्रीकालिका पुराण 08 २४७
मेरे साथ रमण करेंगे। इसी चिन्ता में परायण होती हुई काली स्वप्न में
परमेश्वर का अर्चन करती हुई सदा नहीं परम प्रभु की चिन्ता में तत्पर
रहा करती थीं। आगे काली जब महेश्वर का ध्यान करती थी तब
भगवान् भूतेश ने उसको स्वभाव में परिस्थित हुए जाना था। किन्तु उस
समय में गर्भवत बीजों से युत देह वाली है। इससे उस समय में उसको
गिरीश ने अधृत व्रत वाली को भार्या बनाने के लिए ग्रहण नहीं किया था।
महादेवजी ने उस समय उसे देखकर यही सोचा था कि यह गिरि
की पुत्री किस प्रकार से तपश्चर्या के व्रत को करेगी। किए हुए व्रत
से और संस्कारों से गर्भबीज से वर्जित काली को जो निजा और अति
दूषिता है अपनी प्यारी भार्या के रूप में ग्रहण करूँगा। व्रत से और
संस्कारों से गर्भ के बीज की विमुक्ति होती है। इससे जैसे भी यह
काली व्रत करे, यह कैसे युक्त होवे। भूतेश शम्भु यह चिन्तन करते
हुए समय में मन लगाने वाले होकर संस्थति हो गये थे। ध्यान में
समासक्त होने से अन्य कोई भी चिन्ता न हुई थीं। काली प्रतिदिन
भक्तिभाव से शम्भु की अत्यधिक सेवा किया करती थी और उस
महात्मा के स्वरूप का निरन्तर चिन्तन किया करती थी। ध्यान में
परायण हर नित्य ही प्रत्यक्ष हुई काली को भूलकर पूर्व वृत्तान्त को
देखते हुए भी नहीं देखते थे।
इसी बीच में दैत्यों का राजा तारक ब्रह्माजी के वरदान से बहुत ही
घमण्डी होकर देवों और सभी लोकों को बाधा दे रहा था। तीनों लोकों
को अपने वश में करके वह स्वयं ही इन्द्र बन गया था। उसने सब देवों
को भगा कर उनके पदों पर अपने दैत्यों का नियोजन कर लिया था।
उसके राज्य में यम अपनी इच्छा से लोकों का नियोजन नहीं करता था।
उसके भय से सूर्य भी लोक को ताप नहीं दिया करता था। चन्द्रदेव
तो अपनी किरणों के द्वारा उनका नम्र साचिव्य किया करता था अर्थात्
दास होकर वह रात-दिन उनकी सेवा में ही निरत रहता था। वायु सदा
ही सुगन्ध गम्भीरता और शीतलता से एवं स्निग्धता से समन्वित होकर
उस नृप के शासन से उसको वीजित करता हुआ ही वहन किया करता