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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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२४४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
भगवान शिव का हिमवान में निवास
वहीं पर परम से पर अक्षर अपने आत्मा को तथा नित्य ही ज्ञानमय
चित्त एवं निरामय और निराकुल ज्योतिरूप, प्रदीप की आभा वाले,
जगन्मय, द्वैत से हीन, विशेष रूप से एकाग्र होकर भर्ग भगवान् शिव
चिन्तन करने लगे। कुछ दूसरे नन्दी, भृङ्गी आदि जो गण थे वे
महाभाग द्वारों पर स्थित थे किन्तु ध्वनि नहीं होती थी। वे सभी
शब्दहीन होते हुए संस्थित थे अन्य गण वहाँ से सुदूर अन्तर पर स्थिर
होकर क्रीड़ा कर रहे थे। कुसुमों, दलों, भक्तों और गिरि के झरनों से
रत्नों को खोजते हुए गैनिकों से भूषित वे गण थे। गिरिराज गणों के
सहित गए हुए भगवान् हर का विलोकन करके गणों के सहित अपने
स्थान औषधिप्रस्थ से निर्गत होकर पूजा के लिए उपस्थित हुए थे और
यथोचित रूप से उनका अभ्यर्चन किया था। भगवान् शम्भु ने भी
पराश्रद्धा से संयुक्त होकर उसकी अर्चना ग्रहण की थी। ध्यान योग में
स्थित मुस्कराते हुए से उस गिरिराज से ईश्वर ने कहा-मैं आपके इस
प्रस्थ पर तप का समाचरण करने के लिए ही इस एकान्त स्थल में
समागत हूँ। मेरे समीप में कोई भी न आये ऐसी व्यवस्था कर दीजिए।
आप महान् आत्मा वाले हैं आप जगत् के धाम है और मुनियों के
सदाश्रय हैं। देवों, राक्षसों, यक्षों और किन्नरों तथा द्विजातियों के सद्
आवास, हे गिरिश्रेष्ठ! मैंने वहाँ पर आश्रय ग्रहण किया है सो अब जो
योग्य हो वह सब करिये। इतना कहकर जगतों के स्वामी वृषभध्वज
चुप हो गये थे। उसी समय गिरिराज ने भगवान शम्भु से प्रणय पूर्वक
यह कहा था। हे परमेश्वर! आप तो जगतों के स्वामी हैं। आपने मुझे
पवित्र कर दिया है कि आपने इस मेरे देश में समागम किया है। इससे
आगे जो भी मेरा कर्त्तव्य हो वह मुझे उपदेश कीजिए। आप तो महान्
तप के द्वारा यत्नों में परायण देवों के द्वारा भी प्राप्त नहीं हुआ करते
हैं। हे जगन्नाथ! मेरा बड़ा सौभाग्य है कि आप स्वयं ही यहाँ पर
पदार्पण कर उपस्थित हो गये हैं। मैं तो यही समझता हूँ कि मुझसे
अधिक धन्य कोई भी नहीं हैं। और न मुझसे अधिक कोई पुण्यशाली