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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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इस कारण ब्रह्माजी की ही आराधना करनी चाहिए ऐसा ही हे मित्र!
आपका भी कथन है। हे महाबाहो! उनके पुत्र लौहित्य के जल की
सन्निधि में आपके द्वारा में अध्यापति किया गया हूँ जिस तरह से गुरु
के द्वारा शिष्य को पढ़ाया जाता है। हे धीर! जैसे मित्र को मित्र परम
वाल्गु साम से किया करता है। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इतना बाण से
कहा-इतना बाण से कहकर महाबाहु वज्रध्वज ने यथावत उस मित्र की
पूजा की क्योंकि वह मित्रों पर प्यार करने वाला था। क्षिति की पूजा
की क्योंकि वह मित्रों पर प्यार करने वाला था। क्षिति के पुत्र नरक
ने यथोचित् रूप से अर्चन करके और बलि के पुत्र को विदा करके
अत्यन्त उग्र रूप से ब्रह्माजी की आराधना करने की इच्छा की थी। वह
महात्मा लौहित्य के तट पर जो कि नदों का राजा था ब्रह्माचल पर
स्थित होकर तप श्रर्या करने के लिए उपस्थित हो गया। उस क्षिति के
पुत्र ने मनुष्यों के मान से सौ वर्ष तक जन के आहार के व्रत से पितामह
की अर्चना की थी।
लोकों के पितामह सौ वर्ष तक तप करने के अन्त में परम सन्तुष्ट
हुए थे और प्रत्यक्ष नरक के सामने समुपस्थित हो गये। हे सुव्रत! मैं तुम
पर बहुत प्रसन्न हूँ। मैं तुमको वरदान दूँगा। जो भी चाहो वर माँग लो।
उन भगवान् कमलासन ने इस अवसर पर नरक से कहा था। उस नरक
से समस्त लोकों के स्वामी कमलासन प्रभु का प्रत्यक्ष दर्शन करके उसने
उनको प्रणाम किया था और फिर दोनों को कर जोड़ विनय से अवनत
कन्धरा को करके बोला हे सुरश्रेष्ठ! आप मुझे एक वरदान यह दीजिए
कि मैं देवों असुरों से-राक्षसों से और सभी देव योनियों में अवध्य होऊँ
अर्थात् वध होने के योग्य न रहूँ। मेरी सन्तति भी विच्छिन्न न होवे और
वह तब तक रहे जब तक ये चन्द्र दिवाकर रहें। हे लोकेश्वर! तभी
तक मेरी सन्तति कायम बनी रहे-यही मेरा दूसरा वरदान है। तिलोत्तमा
आदि जो देवियाँ सुन्दर रूप और गुणों से समन्वित हैं वे-वे सब
सोलह सहस्त्र मेरी दयिता हो जावें। मुझे अजेयत्य की प्राप्ति होवे
अर्थात् मैं किसी विजित न होऊँ और श्री मुझको कभी भी परित्याग न