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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

Page 208 of 442

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Page 208

२१० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
करते हुए उस नौका को प्रेरित करूँगा। हे मनुदेव! फिर जलों के शुष्क
हो जाने पर हिमालय पर्वत के बहुत ऊँचे शिखर पर उसमें नाव को
बाँधकर जिस जाप के योग्य मन्त्र के द्वारा आपने मेरी आराधना की है
उस मन्त्र के द्वारा जो मुझे सन्तुष्ट करता है उसको सभी प्रकार की
सिद्धियाँ होती हैं।
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इस प्रकार के वरदान देकर वह मत्स्य
उनके द्वारा नमस्कृत हुए थे अर्थात् उसने मत्स्य को प्रणाम किया था।
फिर वह जगत् के स्वामी लोकों पर अनुग्रह करने वाले अन्तर्धान हो
गये थे। स्वायम्भुव मनु भी भगवान हरि के अन्तर्धान हो जाने पर
भगवान हरि ने जैसा कहा वैसी ही नौका और रज्जु का निर्माण कराया
था। उस समय में स्वायम्भुव मनु ने समस्त यज्ञों से सम्बन्धित वृक्षों को
छेदन कराकर उनको उद्धृत करके वस्यादि के द्वारा नौका का निर्माण
कराया था। उन वृक्षों के वल्कल (छाल) से समुद्भूत सूत्रों के समूहों
से पूर्व में कथित परिमाण से मनु ने वरीरिका की रचना कराई थी।
उसके अनन्तर बहुत अधिक काल तक भगवान यज्ञ वाराह विष्णु का,
शम्भ का और हर का महान अद्भुत युद्ध हुआ था। इसके उपरान्त
जल से प्लावन होने पर तथा तीनों के विध्वंस हो जाने पर उसी समय
में रज्जु से नौका को बाँध करके बीजों का आदान करके मनु ने वेदों
को और ऋषियों को लाकर उस नौका में रखकर चराचर सबके जल
में मग्न हो जाने पर उसी सवार पर मनुदेव ने नाव में स्थित होते हुए
मत्स्य मूर्ति भगवान् हरि का स्मरण किया था। इसके अनन्तर शिखर
से संयुक्त पर्वत के ही सदृश जलों के ऊपर भगवान् मत्स्य समागत हो
गये थे।
मत्स्य का स्वरूप धारण करने वाले भगवान् विष्णु एक शृंग से
समन्वित वहीं पर समागत हो गये थे और तनिक भी विलम्ब नहीं किया
था जहाँ पर नाव से मनुदेव संस्थित हो रहे थे। उस महान भयंकर और
बहुत ही विस्तृत जल के समुदाय में नौका पर समारूढ़ होकर जब तक
जल चलाचल था तभी तक उस जल के पृष्ठ भाग पर नौका को