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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

Page 203 of 442

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Page 203

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २०५
शरीर वाले उस मत्स्य का अवलोकन स्वयं करके उसको अपने हाथ
से ग्रहण करके वे विकसित कमलों से संयुक्त सरोवर को चले गये
थे। वह सरोवर वहाँ पर परम पुण्य नर नारायण के आश्रम में बहुत
विस्तृत था। वह एक योजन के विस्तार वाला तथा डेढ़ योजन
आयताकार था। उसमें उनके भीत गण थे। उस सरोवर में उस मत्स्य
को डाल करके उस समय में मनु ने वहाँ पर निर्धारित कर दिया था।
उस मत्स्य का उन्होंने अपने पुत्र की ही भाँति परम अनुग्रह से युक्त
होकर पालन किया था। वह मत्स्य बहुत ही थोड़े समय में परमाधिक
स्थूल और विस्तृत हो गया था। हे श्रेष्ठ द्विजोँ! वह मत्स्य उस सरोवर
में भी समाया नहीं था। क्योंकि बहुत ही बड़ा हो गया था। वह मत्स्य
एक बार पूर्व और उत्तर दोनों किनारों पर अपना शिर और पूँछ रखकर
ऊँचे शरीर वाला हो गया था फिर वह स्वायम्भुव महात्मा से चिल्लाकर
बोला-मेरी रक्षा करो। मनु ने उसको स्थूल पूँछ वाला समझकर वह
उस समय में उस महामत्स्य के समीप पहुँचे और अपने हाथ के द्वारा
उसको उन्होंने ग्रहण किया था।
मैं विपुल रोमों वाले अतीव अद्भुत आपका उद्धार करने के लिए
समर्थ नहीं होता हूँ, ऐसा भली चिन्तन करते हुए भी उन्होंने हाथ से
उसको धारण कर लिया था। विश्व के आत्मा भगवान् जनार्दन भी
जिन्होंने मत्स्य का स्वरूप धारण कर रखा था स्वायम्भुव मनु के कर
को प्राप्त करके फिर छोटे स्वरूप का उपाश्रय ग्रहण कर लिया। फिर
मनु ने करों से उसको उठाकर अपने कन्धे पर धारण किया था और
शीघ्र ही उसे सागर में ले गये थे और वहाँ जल में उसको रख दिया
था। उन्होंने उस मत्स्य को कहा था-वहाँ आप अपनी इच्छा के अनुसार
बढ़िये यहाँ पर कोई भी आपका वध नहीं करेगा और आप शीघ्र ही
सम्पूर्ण देह की प्राप्त करिए। यह कहकर समस्त प्राणधारियों में
परमश्रेष्ठ वह महान भाग वाले ने उसकी लघुता (छोटेपन) का चिन्तन
करते हुए ही परमाधिक विस्मय को प्राप्त हो गये थे। वह मत्स्य भी
तुरन्त ही उस समय में महान् पूर्ण शरीरवाले हो गये थे और अपने