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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

Page 197 of 442

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ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ १९९
यज्ञों के लोक जिनके द्वारा इस समय में भी विभावित किए जाते हैं,
उत्पन्न हुए थे। इसके पौत्र से स्रुक् उत्पन्न हुई थी और नासिका से स्रुव
हुआ था। अन्य जो भी स्रुक् और स्रुव के भेद अभेद हैं वे पौत्र और
नासिका से समुद्भूत हुए थे।
हे मुनि सत्तमो! उसके ग्रीवा के भाग से प्राग्वंश समुद्भूत हुआ
था। इष्टा पूत्ति, जयु धर्म श्रवण के छिद्र से उत्पन्न हुए थे। दाढ़ों से
यूप, कुशा और रोम समुत्पन्न हुए थे। उद्गाता, अध्वर्यु, होता और
शामित्र ने जन्म ग्रहण किया था। ये अग्र, दक्षिण, वाम अंग, पश्चात्
पादों में संगत हैं। पुरोडाश चरु के सहित मस्तिष्क के स्रव से
समुद्गत हुए थे। खुर से यज्ञ केतु ने जन्म ग्रहण किया था। रेतोभाग
से आज्य और स्वधा मन्त्र समुद्गत हुए थे। यज्ञ का आलय पृष्ठभाग
से और हृदय कमल से यज्ञ समुत्पन्न हुआ था। उसकी आत्मा यज्ञ पुरुष
है उनकी भुजायें कक्ष से समुद्भूत हुई थीं। इसी प्रकार से जितने भी
यज्ञों के भाण्ड हैं और हवियाँ हैं वे सभी यज्ञ वाराह के शरीर से हुए
थे। इस रीति से उन यज्ञ वाराह का शरीर यज्ञता को प्राप्त था।
ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर ने इस प्रकार से यज्ञ को करके वे फिर
यत्नों में तत्पर हुए सुवृत्त, कनक और घोर के समीप में प्राप्त हुए थे।
इसके अनन्तर उनके शरीरों को पिण्ड बनाकर पृथक्-पृथक् तीनों देवों
ने तीन शरीरों को मुख की वायु से अर्थात् फूँक लगाकर विशेष रूप
से धमन किया था। स्वयं ही जगत के सृजन करने वाले फिर
दक्षिणाग्नि हो गए थे। भगवान केशव ने कनक के शरीर का धारण
किया था। फिर पञ्च वैतान के भोजन करने वाला गार्हपत्याग्नि हुआ
था। फिर वाह्वानीय अग्नि उसी क्षण में समुद्भूत हो गया था।
इन तीनों से सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो गया था और वह समस्त जगत्
तीन मूलों वाला है। हे द्विज श्रेष्ठों! जहाँ पर ये तीनों नित्य ही स्थित
रहते हैं वहाँ पर समस्त देवगण अपने अनुचरों के साथ निवास किया
करते हैं। यह तीनों का स्वरूप नित्य ही कल्याण का स्थान है और यही
तीनों का स्वरूप है। यह त्रयी की विधि का स्थान हैं और यह परम