कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in context൵ श्रीकालिका पुराण ൵ १७
आपके ही मुख से कहा हुआ वेदों के मार्ग का निश्चय है कि जैसी
माता होती है वैसी ही जामि होती है और जैसी जामि होती है वैसी ही
सुता हुआ करती है। हे विधे ! हे ब्राह्मण ! हे चतुरानन ! यह समस्त
जगत् धर्म में ही है और कैसे इस क्षुद्रकाम के द्वारा यह सब विघटित
कर दिया है ?
एकान्त योगी सर्वदा दिव्य दर्शन वाले, किस कारण से और कैसे
दक्ष मरीचि आदि मानस पुत्र स्त्रियों में लोलुप हो गये थे ? मन्द आत्मा
वाला और अभी कर्म को प्राप्त करने को उद्यत हुआ कामदेव भी कैसा
अल्प बुद्धि वाला है और समय को नहीं जानता है कि उसने आप
लोगों को ही अपने शरों का लक्ष्य बना डाला है। हे मुनिश्रेष्ठ ! उसके
लिए धिक्कार है जिसकी कान्तागण हठपूर्वक धैर्य का आकर्षण करके
चंचलताओं में उसके मन को मज्जित कर दिया करती है। मार्कण्डेय
मुनि ने कहा- उन गिरीश भगवान् के इस वचन को श्रवण करके
लोकों के ईश लज्जा से एक ही क्षण में दुगुने पसीने से भीगे हुए हो
गए थे। इसके उपरान्त चतुरानन ब्रह्माजी ने इन्द्रियसम्बन्धी विकार को
निगृहीत करके ग्रहण करने की इच्छा समन्वित होते हुए भी उस
कामरूप वाली सन्ध्या का परित्याग कर दिया था। हे द्विजश्रेष्ठो !
उसके शरीर से जो पसीना गिरा था उससे अग्निष्वात वर्हिषद पितृगण
समुत्पन्न हुए थे। ये सब भिन्न हुए अंजन के सदृश थे और विकसित
कमल के समान इनके नेत्र थे। ये अत्यन्त अधिक यति, परमपवित्र
तथा संसार से परमाधिक विमुख हुए थे। अग्निष्वात चौसठ सहस्र
कीर्त्तित किए गए हैं। हे द्विजगणों ! छियासी हजार वर्हिषद बताए गए
हैं। दक्ष के शरीर से जो पसीना भूमि पर गिरा था उससे सम्पूर्ण गुणों
से सुसम्पन्न वरांगनायें उत्पन्न हुई थीं। वे वरांगनायें तन्वंगी, क्षीण
मध्यभाग वाली और परम शुभ शरीर की रोमावली संयुत थीं जिनका
अंग अत्यधिक कोमल था तथा परम सुन्दर दर्शन पंक्तियाँ थीं और तपे
हुए सुवर्ण के ही तुल्य उनके शरीर की रोमावली संयुत थीं और तपे हुए
स्वर्ण के ही तुल्य ही उनके शरीर की कान्ति थी। मरीचि उनमें प्रधान