कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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(३७)
तब सत्य पुरुष आज्ञा मोहि कीन्हा। तत क्षण आय पृथ्वी पग दीन्हा
बार अनेक कीन्ह मिलापू। धरम दास नहिं चेतहु आपू ॥
पाहन पूजि ध्यान मन लाये। सदगुरु शब्द चीन्हि नहिं पाये ॥
तीरथ व्रत कीन्ह बहु करनी। रूपदास गुरुकी गहि शरनी ॥
तासु प्रीति तोहि आन जगावा। नाम प्रताप यह परभावा ॥
जो जिव नाम तुम्हारा लैहैं। ताहि जीवको काल न खेहैं ॥
सदगुरु भक्ति जाहि कुल होई। तरे एकोतर पुरुषा सोई ॥
दूसरी प्रतियोंमें नोचे लिखे अनुसार है
सदगुरु वचन
धर्मनि सुनु आपनी करनी। जेहि तोहि मिले उशब्द भौतरनी ॥
द्रापर अन्त सुपच तुम रहेऊ। तव सुत एक सो मम व्रत गहेऊ ॥
तासु प्रीति तोहि आनि जगावा। है परताप नाम परभावा ॥
सदगुरु भक्ति जाहि कुल होई। तरे एकोतर पछिला सोई ॥
वही संयोग तोहि हम भेटे। तुव सुत प्रीति तार दुख मेटे ॥
नोट—एक प्रतिमें तो ऊपरके प्रमाणहो लिखा है किन्तु कई प्रतियोंमें ऊपरको नो पंक्तिके बदले नोचेकी पंक्तियाँ लिखीं हैं। पाठक गण स्वयम् विचार करके जो उत्तम और प्रामाणिक समझे वह रखें और पाठ करें। किन्तु इतना तो अवश्य कहा जायगा कि भिन्न २ ग्रन्थोंमें इन दोनों बातों का प्रमाण मिलता है। और लेखक महात्माओंकी कृपा से पक्षपात और अविद्यावश कबीरपंथके ग्रन्थोंकी जो दुर्दशा हुई है वह साक्षर वर्गसे छिपा नहीं है। ग्रन्थोंकी यही दशा देखकर स्वयम् कबीर पंथ यहाँतक बंशधर कहीं कतिपय महंत संत लज्जावश हो किसीके सामने इन ग्रन्थोंका नाम लेते भी सकुवाते हैं। और हृदयसे इन सब ग्रन्थोंपर अभ्रदा रखते हैं। इस ज्ञान प्रकाश की कई प्रतियाँ मेरे पास उपस्थित हैं किन्तु किसी भी प्रतिका एक दूसरे के साथ मिलाप नहीं होता है। इसी प्रकारसे लगभग सब ग्रन्थोंकी दशा हो गयी है। जो जो नवीन प्रतियाँ हैं उन सबोंमें अटपट छन्दोंमें अर्थमंग और भावमंग आदि दोष पूर्ण रीतिसे भरे हैं। हाँ पहलेकी प्रतियाँ कुछ शुद्ध हैं उसीके अनुसार जहाँतक होता है रखनेका प्रयत्न करता हूँ। ऐसा करनेपर भी प्रस्तुत विषयके समान जहाँ संबंध विषय आजाते हैं वहाँ-वोनों को रख देना उचित जानता हूँ। इतना होगा जिनके पास जैसी २ प्रति होगी वे अपनी प्रति—