कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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(१४५)
चौपाई
यहि संसार बहु वैद्य विराजे । नाना भाँति औषधी साजे ॥
साच एक झूठा बहुतेरा । विना साँच नहिं होय निवेरा ॥
एक असल पर नकल अनेका । अनेक नकल नहिं पावे एका ॥
बहुविधि ठग सब करे ठगाई । यमके फन्दा रहे अरुझाई ॥
बूझि समझिके औषध कीजै । मिथ्यामें जिव काहेको दीजै ॥
मसला
गुरु कीजिये जानिके, पानी पीजै छानिके ॥
चौपाई
वेद पुराण किताब कुराना । दोहा साखी शब्द परमाना ॥
अनन्त भाँतिका शब्द पसारा । विनु जाने नहिं होय सुधारा ॥
सो सब औषध बहु विधि जाचे । यम फन्दासे तबही बांचे ॥
पक्ष वाणीको मन मत कहिये । जाते द्रन्द सबै घर लहिये ॥
निर्णय वाणी गुरु मत होई । पक्षा पक्ष जाते सब खोई ॥
जब निर्णयकी वाणी आवै । झूठा खोटा आपु लजावै ॥
निर्णय सो सबके हितकारी । जेहि परसे जिव होय सुखारी ॥
सार शब्द निर्णयको नामा । जाते होय जीवको कामा ॥
गुरु एक जो निर्णय करई । झगरा कबहुँ परे न परई ॥
जो कोइ निर्णय आश्रित भयऊ । सेवा करि निज कारज कियऊ ॥
सो सब सेवा शिष्य कहावै । मन मत सो जो और बतावै ॥
जग बुद्धि कहे मम गुरु एका । जेहि तेहि सेवा करे अनेका ॥
पुनि जाको इन गुरु ठहराई । ताको दूसर गुरु सहाई ॥
तेहिकी सेवा करे लौ लाई । सो सेवा पद कैसे कहाई ॥