कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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लगी—हे विद्वोहिणी ! दुराचारिणी विद्या ! तू कहीं भी चूकती नहीं है । प्रवृत्ति जो सौत निवृत्ति है उसके समाजमें सदा वास करके उसके पुत्र विवेकको पाठ कुपाठ अर्थात् सत्य झूठकी बात कह कहकर उसे बहकाती है और प्रवृत्तिके वंशका नाश भी तूने ही कराया है ।
जो वांछित सा कीनो अब कित भावसी ॥
जरे पर तैं माहुर भले लगावसी ॥
टीका—हे विद्या ! जो तेरे मनमें था सो तूने कर लिया अब क्या करना चाहती है कि जलेपर जहर लगाने आयी है आशाकी ऐसी दुष्ट वाणीको सुनकर विद्याने उसकी उपेक्षा की और मनराजासे कहने लगी ।
स्वामी चित धीरज धरि नीति विचारिये ॥
उभय नारि प्रतिपालक कितहिं विसरिये ॥
टीका—विद्याने कहा हे महाराज मन ! आप नीतिपूर्वक विचार करके देखिये कि आप अपनी दोनों स्त्रियोंके पालन पोषण करनेवाले हैं । सो आप इस धर्मको कहाँ भूल गये हैं । आप अबतक प्रवृत्तिमें सम्पूर्ण लिप्त होरहे हैं और निवृत्तिको एकदम भुला दिया है उसकी ओर भी दृष्टि उठाकर देखिये । इस प्रकारसे मनराजासे कहकर विद्या आशाकी ओर फिरी और उसको डांटा—
भाग भाग दूती भामिनी नित्य इच्छा चहै ॥
प्रवृत्ति है भारी देह अजहूँ चिता गहै ॥
टीका—विद्या कहती है । हे दूती ! आशा ! यहाँसे भाग जा यहाँसे भाग जा । देखती है कि, मनराजाके साथ प्रवृत्ति शरीर रूप होकर साक्षात् इतने बड़े स्वरूपसे विराज रही है तथापि उसको फिरसे और भी बड़ा बनानेके लिये चिता कर रही है ।