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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished2,136 pages

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( १२२ )

विवेकसागर

टीका—जब मोहराजाने एकदमसे अपनी समग्र सेना सहित विवेककी सेना पर चढ़ायी की, तब इधरसे विवेक राजाने भी अपनी समग्र सेनाको शत्रुसे युद्ध करनेकी आज्ञा देदी। अब क्या था, घमासान युद्ध आरंभ हुआ। अपने २ जोड़के योद्धाओंको हूँठ २ कर सब परस्पर युद्ध करने लगे। तहाँ—

बुद्धि कुबुद्धिहिं मारयो धर्मं अधर्मता ॥

तृष्णा हतेउ संतोष सो कर्म अकर्ममता ॥

चंचल तेहि थिर मारेउ पुण्य जो कुकर्मा ॥

दुविधिहिं एकता घातेउ लिपट सूक्ष्मश्रमा ॥

टीका—बुद्धिने कुबुद्धिको मारा, धर्मने अधर्मको तारा, तृष्णाको संतोषने उजारा और कर्मने अकर्मका नाश मारा। स्थिरताने चंचलताको लुप्त किया तो पुण्यने पापको गुप्त किया। द्वैतभावको अद्वैतने तो सहजमें ही नाश कर दिया। इसी प्रकारसे मोह राजाकी समस्त सेनाका सत्यानाश हो गया ॥

छन्द—श्रम ही नमान्योरिपुसँहान्योमोह हुंदुभी बाजई ॥

प्रवृत्ति पुत्र पौत्र सबगत अम्बिका सुनि लाजई ॥

टीका—हे धर्मदास ! विवेकराजा तो इस प्रकारसे शत्रुको नाश करके निश्चित होकर बैठे, आनन्दरूपी दुन्दुभी बजने लगी किन्तु जब प्रवृत्तिने अपने वंशका नाश सुना तब अत्यन्त लज्जित होकर पश्चाताप करने लगी फिर—

आदि आशा सखी मिलि प्रवृत्ति आगे आयऊ ॥

मन राजा पत्नी सुनत क्षय शोक विपति विरागेऊ ॥

टीका—हे धर्मदास ! प्रवृत्तिके सर्वे पुत्र पौत्र कलत्रका नाश हो गया तब वह अत्यन्त शोक और पश्चाताप करती हुई आदि