कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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(११३)
भेद अभेद दोऊ सम ज्ञान विचारहू ॥
अंत अवस्था जानि सोई निरवारहू ॥
टीका—कामके डींग मारनेको सुनकर वस्तु विचारने कहा रे सूठ काम ! तू मूर्ख है तेरेको समझ नहीं पडता है; तू अन्या है तुझको कुछ सूझता नहीं है ।
एकही ब्रह्म आत्मस्वरूप होकर जब सबमें रम रहा है तब स्त्री और पुरुष यह दो लिंग कहाँ हैं । जब एकही सच्चिदानन्द सबमें व्यापक हो रहा है तब कहाँ काम है और कहाँ रति है । जिसने इस प्रकारसे निज स्वरूपको विवेककी सहायतासे जानकर भेदा-भेद को नाश कर दिया है उसके लिये तेरा अस्तित्वही नहीं तब तेरा वश क्या । स्वरूपज्ञान प्राप्त होतेही तेरी अंत अवस्था आजाती है फिर तेरा बल उसके ऊपर नहीं चलता । किस दृष्टि को धारण करनेसे तेरा बल नहीं चलता सो सुन ।
छन्द—निरवारि देखे छानि लेखे दुतिय नहिं कोई कहा ॥
नरवत इत उत करत जहँ तहँ ब्रह्म सब मो रमि रहा ॥
टीका—विवेकी पुरुष ब्रह्म विचारको प्राप्त करनेके लिये जब अन्वयव्यतिरेक करके स्वात्मज्ञानको जानता है और अपने प्राप्त ज्ञानकी परीक्षाके लिये सर्व शास्त्र और आचार्योंके मतको छानता है तब उसे विचार ज्ञान द्वारा स्वात्म-निश्चयात्मक प्राप्त होता है जिससे वह सर्व स्त्री पुरुष जड़ चैतन्य सब ही एक ब्रह्मकी ही लीला देखता है । जिस प्रकार नटको जाननेवाला पुरुष उसके अनेक स्वार्गोंमें भी उसे नट ही जानता है, उसे उसके स्वार्गोंमें दूसरा भाव कदापि नहीं होता । उसी प्रकार ब्रह्मतत्त्वको जाननेवाले पुरुषकी दृष्टिमें जब द्वितीया है ही नहीं तब तेरी स्थिति कहाँ है ।