कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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अनुज कहते हैं (अनु = पीछे, ज = जन्मना) पीछे जन्म लेनेवा-लेको सो यहाँ मन को अनुज कहनेका तात्पर्य यह है कि जहाँ मोह नहीं हो वहाँ मन भी नहीं होता। इस शरीरमें मोह दृढ़ होनेहीसे मन की विशेष प्रवृत्ति इसमें होती है।
त्रयोदशपति (त्रयोदश = तेरह, पति = राजा) तेरह जो पांच ज्ञानेन्द्री और पांच कर्मेन्द्री तथा बुद्धि, चित्त, अहंकार इन तेरहों का राजा है। अर्थात् जब ये इंद्रियाँ विषयमें प्रवृत्त होती हैं तब मनमें उन विषयोंका राग उत्पन्न होता है। इन तेरहोंको पश्चात् उन विषयोंमें मन प्रगट होने पर भी आप सबका राजा बन जाता है। अर्थात् प्रथम इंद्रियाँ विषय को ग्रहण करती हैं पश्चात् मन उनके ऊपर राज करने लग जाता है, इंद्रियाँ सब मनकी आज्ञाकारिणी बनती हैं और मन उनका शासक राजा बनता है।
छन्द-कुमति कीन्हो अयश दीन्हो बन्धु चित्त धरिबूझिये ॥ अंत गर्व न रहत काहू मिथ्या आश न कीजिये ॥ भुनत मोह राज समाज युत्थप क्रोध दारुण खर भरचो ॥ चाहत संघारन दूतको जिमि आज्य अनिल में परचो ॥
टीका-शीलने कहा है मोहराज ! ऐसे प्रतापी जो आपके पिता मन राजा हैं उनको भी आपने अपने इस विरोधसे अय-शका भागी बनाया है। सब यही कहेंगे कि देखो मनराजा ऐसा हो गया है कि अपने पुत्रोंको भी सम्हाल नहीं ले सकता, उसके पुत्र सब स्वतन्त्र बनकर परस्पर कटे मरते हैं। इस हेतु हे मोह-राजा ! आप कुमतिके कहनेमें न आकर बन्धु विरोधमत कीजिये। और यदि इस बात को नहीं मानते हैं तब इस बातको स्मरण