Skip to content
SarvaKosh
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished2,136 pages

Page 391 of 2136

Read in context
Page 391

विवेकसागर

( ९५ )

राजाकी प्रवृत्तिका यह ठाटवाट तब है मनको अन्य विभौकी इच्छा कहाँसे होवे ।

अथ निवृत्तिवंश वर्णन

निवृत्ति दूजी अंगना जिहि तिहि मन राजा थोरो चहै ॥
प्रवृत्ति पूजा गति न दूजा ताहि चित निशिदिन रहै ॥

टीका-उस मन राजाकी दूसरी स्त्री निवृत्ति है जिससे मन प्रेम नहीं करता क्योंकि मन प्रवृत्ति नामक स्त्रीमें ऐसा लुब्ध रहता है कि दिन रात उसके बिना मनको क्षणमात्र भी कल नहीं पड़ता है।

तेहि सुत जनेउ विवेक परम दृढ़ आसना ॥

सात्त्विक अस्त्र ले हाथ खड़्ग सो शासना ॥

टीका-उस मन राजाकी निवृत्ति नामक स्त्रीमें विवेक नामका पुत्र उत्पन्न हुआ सो विवेक निश्चल और दृढ़ आसनवाला है और उसने अपने हाथमें सतोगुणका अस्त्र ग्रहण किया है ।

वस्तु विचार, क्षमा दया तेहि आता भयो ।

तेहिको अनुज संतोष अतिहि आनन्द ठयो ॥

विद्या ताहि सहेली नीति बिचारई ॥

शील सनेह, सिखावन, पाठ सुधारई ॥

टीका-विवेक के और भी भाई बहिन उत्पन्न हुए । वस्तु विचार, क्षमा, दया, संतोष, विद्या, नीति, शील, सनेह, शिक्षा-पन और अध्ययन इत्यादि निवृत्तिकी संतान इत्यादि प्रकट हुई । प्र० चं० ना० श्रीअ० दा० जी कृत ।

दोहा-अब रानी निवृत्तिको, वणों सब परिवार ॥

जाके श्रवण बिचारते, मिटै कुमति संसार ॥

सुत विवेक प्रथमे भयो, बड उदार गुण धाम ॥

दूजो वस्तु विचार पुनि, हरे कामना काम ॥

तीजे सुत धीरज भयो, अचल वीर सुखकन्द ॥