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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished2,136 pages

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सत्यनाम

अथ हंसमुक्तावली

अन्तर्गत

मोह और विवेककी कथा सटीक

✱

धर्मदास वचन

धरमदास विनयकरि गुरुपदपंकज गहे ॥
हो प्रभु होहु दयाल दास चित अतिहि दहे ॥
मन स्थिर नहि राजत पल प्रति संधना ॥
कैसे मन थिर होय कहो जग वन्दना ॥

टीका—एक समयके विषय जब कबीर साहब और गुरु धर्मदास साहब दोनोंही प्रसन्नचित्त सत्संगमें मगन थे उस समय मनके प्रसंग पड़ने पर कबीर साहबने कहा कि मनको स्थिर कर गुरुकी वाणी में लौ लगाकर पारख करनेसे सत्य पद की प्राप्ति होती है।

इतने वचनको सुनकर गुरु धर्मदासजीने सतगुरुके चरणको पकड़कर बहुत अधीनतासे विनय किया कि, हे भगवन् ! हे प्रभु ! मुझ दासका चित्त सदाही चिन्ता से दहन हुआ करता है। चित्त किस लिये दहन होता है इस प्रश्न के उपस्थित होनेपर कहते हैं कि, हे प्रभु ! आपने कहा कि, मनको स्थिर कर गुरुके शब्दमें लौ लगा, सो मन तो पलमात्र भी स्थिर नहीं होता है, यह मन जिस प्रकारसे स्थिर होकर आपके चरण-कमलोंमें लग जावे सो मुझसे कहिये। हे प्रभो ! आप समस्त जगत्के पूज्य और वन्दनीय हो, आप के विना मेरे चित्तका दुःख कोई भी छुड़ानेको समर्थ नहीं है।