कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextहै किन्तु, कबीरकी वाणी और सिद्धान्तको समझे बिनाही उनका यह मिथ्या प्रलाप है ।
कबीर साहबका स्वतः बीजक में ही वचन है—
“ वेद इसस्मृति कहै किन झूठा जो न विचारे ” साखीमें आप कहते हैं—
जाको मुनिवर तप करें, वेद थके गुण गाय ।
सोई देउँ सिखापना, कोइ नहीं पतियाय ॥
इस साखीको लेकर कई लोग शंका कर बैठते हैं कि, बाह कबीर साहब भी तो वही कहते हैं कि, जिसको वेद और ऋषि मुनि कहते हैं । किन्तु, ऐसी शंका करनेवाले बड़ी भूल करते हैं, वे इस साखीके अर्थ पर ठीक ठीक ध्यान नहीं देते— इस साखीमें साफ साफ कहा है “ वेद थके गुण गाय ” अर्थात् जिसका गुण गाते २ अर्थात् जिसको ढूंढते ढूंढते वेद भी थककर “ नेति नेति ” “ न इति न इति ” “ यह नहीं ? यह नहीं ” कहकर मौन धारण कर लेता है । और मुनि ऋषि तप द्वारा जिसको खोजते खोजते हार जाते हैं, विद्वान् पण्डित सर्व विद्या-सम्पन्न होकर भी जिसको नहीं पासकते, उसीके पहचानकी मैं सिखावन देता हूँ किन्तु, वेद और तपादिकों के जालमें पड़े हुए विद्वान् ऋषि मुनि लोग विद्या और तप आदिके अभिमानमें मेरी बात नहीं मानते ।
इस बातका प्रमाण छान्दोग्य उपनिषत्के सातवें ब्राह्मणमें नारद और सनत्कुमारकी गाथासे मिलता है । अवसर पाकर वहभी किसी स्थानमेंदिखानेका प्रयत्न करूँगा ।
अनुवादक—
श्रीयुगलानन्द बिहारी ।
पचीसवाँ प्रकरण
वेदके प्राकट्यपर मतभेद ।
बहुतलोग ऐसा अनुमान करते हैं कि ये वेद ईश्वरकी वाणी हैं तथा उसीने आदित्य, अग्नि, वायु, अङ्गिरा इन चार ऋषियोंद्वारा इनको प्रगट और प्रचलित किया है । मैं पहिले लिख आया हूँ कि, निरञ्जनने कूर्मजीसे रचनाका सामान लिया कूर्मजीका तीन शिर जब निरञ्जनने अपने नखोंद्वारा काट दिया तब उनके पेटके भीतर सूर्य, चन्द्र तथा नक्षत्रादि निकल पड़े और अग्नि, आदित्य, वायु, अङ्गिरा, उसी समय प्रकट हो गये । उस समय ब्रह्मा प्रकट नहीं हुए थे