कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextसृष्टिकी रचना होती है, इसीसे, परलय-प्रलय होता है, सुख-आनन्द और दुःख-कष्ट, इसीमें हैं, फिर वारंवार, आवै-जन्म लेते हैं, फिर-वारंवार, जाहि-मरते हैं ।
एकही ब्रह्माण्डके भीतर अनेक तरहके प्राणी अपने २ सुखके लिये आप प्रयत्न कर रहे हैं । उत्पत्ति, प्रलय, सुख, दुःख, जन्म और मरण सब इसीमें हैं ॥ १९ ॥
तेहि पाछे हम आइया, सत्य शब्दके हेत ॥
आदि अन्तकी उत्पत्ती, सो तुमसो कहिदेत ॥ २० ॥
तेहि-उसके, पीछे-पीछे, हम-मैं, सत्य-साचे, शब्दके-रामनामके, हेत-कारन, आइया-आये । आदि अन्तकी सर्व प्रथम रामनामके जगत् मुख अर्थसे संसारकी तथा रामनामके यथार्थ अर्थ जानकर साहिबके लोकमें गमन की । उत्पत्ति-प्राप्ति, जैसे हुए, सो-वही, तुमसों-तुमसे, कहि-कहे, देत-देत है ।
उद्धारके लिये दिये गये रामनामका उलटा अर्थ देखकर हमें भगवान्ने भेजा जिस तरह जगत् हुआ एवं जैसे हमारे बताये हुए अर्थका अनुसंधान करनेसे साहिबके लोकको चला जाना होता है यह सब बात हम तुमसे कहे देते हैं ॥ २० ॥
सात सुरति सब मूल है, प्रलयहु इनहीं माहि ।
इनहीं मासे उपजे, इनहीं माहि समाहि ॥ २१ ॥
सब-सबका, मूल-मुख्य कारन, सात सुरति-पहिले बताई हुई सात सुरति हैं, प्रलयहु-प्रलय भी, इनहीं-इन्हींके, माहि-भीतर है, इनहीं-इन्हींके, मासे-भीतरसे, उपजे-उत्पन्न होता है, इनहीं-इन्हींके, माहि-भीतर, समाहि-लय हो जाते हैं ।
दोनों इच्छाएं तथा पांचही सबके मूल कारण हैं इन्हींसे उत्पत्ति होती है एवम् प्रलय भी इन्हींमें हो जाता है ॥ २१ ॥
सोई ख्याल समरथ कर, रहे सो अछप छपाई ॥
सोई संधि लै आइया, सोवत जगहि जगाई ॥ २२ ॥
सोई-वही यह समष्टि जीवने, समरथ-अपनेको समर्थका, ख्याल-ध्यान, कर-कर लिया । सो-वे, अछप-न छिपनेवाले, इसकी दृष्टिसे, छपाइ-छिप, रहे-गये । सोई-उसी, सन्धि-बीचके, समाधानको, लै-लेकर, आइया-आया, सोवत-सोते हुए, जगहि-संसारको, जगाइ-जगानेके लिये ।
समष्टि जीवने अपनेको सब कुछ मान लिया इस कारण व्यापक राम इसकी दृष्टिसे ओझल हो गये । जिस सन्देहमें जीव पड़ गया है मैं उसीका