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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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जबतक यह माताके गर्भमें रहता है इसके हाथ पाँव बंधे रहते हैं अपनेसे खाना पीना नहीं जानता, ऐसी विवशताकी दशामें विश्वम्भर उसकी नाभीमें एक नल लगाकर, उसीके द्वारा इसको भोजन देकर उसकी रक्षा करता है । गर्भसे बाहर होनेके पहले माताके स्तनोंमें दूध भर देता है, उसके लिये अत्यन्त प्रेमी और सच्चे सेवक उपस्थित कर देता है जो उसकी पूर्ण अवस्थामें पहुँचने तक इसके लिये अपना प्राण भी निछावर करनेको तैयार रहते हैं ।

मनुष्यको तो प्रभुने हाथ पैर दिये, पशुओंको स्वयं वस्त्र पहनाया तथा उनके भोजनका प्रबन्ध किया । मनुष्यका शरीर वस्त्रोंसे ढकता है तो अन्य जीवधारियोंके शरीर उनके बाल, पर और दुमोंमें ढक देता है कोई जड़ली जीवधारी भोजन और वस्त्रके मोहताज नहीं होते, जो जीवधारी जिस अवस्थामें है, प्रभु उनका पालन उसी अवस्थामें करता है ।

तुलना—शारीरिक सुख और विषयवासना इन्द्रसे लेकर मनुष्य, पशु, पक्षी, कीड़े मकोड़े सबमें समान है । सब अपने भोजन छाजन और विषय भोगके ग्रहण करनेमें एकही प्रकारके हैं । सुख दुःखमें एकही समान हैं बल्कि अमीरसे गरीब अधिक सुखमें हैं, क्योंकि, संसारी वैभव जितनाही होता है उसको उतनाही चिन्ता, रोग, शोक बढ़ता है, गरीबोंको उतनाही कम होता है । निश्चिन्तता अथवा थोड़ी चिन्तामें विशेष सुख है । बहुत धनवान्, बहुत चिन्ता, शोच और भयमें पड़ा रहता है, गरीब दो रोटी खाकर बेफिक्र सो जाता है । इन्द्र जैसे इन्द्राणीसे प्रसन्न होता है, उसी प्रकार शूकर अपनी शूकरीके साथ सुखको प्राप्त होता है, इन्द्रको जैसे शूकरीसे घृणा है, वैसेही शूकरको इन्द्राणीसे भी भय है । पशुओंके राजा, मनुष्योंके राजासे किसी बातमें घटे नहीं होते ।

मनुष्यसे बन्दर—सब जीवधारी अपनी २ योनिमें उसी प्रकार सुखी हैं जैसे कि, मनुष्य अपने शरीरमें सुखी होता है । बन्दरोंके वर्णनमें लिखा जा चुका है कि, एक बाबर्ची बन्दरोंके साथ रहनेसे बन्दर बन गया । उसीके बशमें अफ्रीकाके सब बन्दर हैं । उसकी स्त्रीने बहुत कहा पर वह उसके साथ न रहा, बन्दरोंके साथही रहना अच्छा लगा ।

वस्त्रादि भोग—चिलमैन सोंप, रेशमी कीड़ा और गिरगिट आदि विविधि प्रकारके रङ्ग बदला करते हैं । उनके सामने मनुष्यकी क्या बात है चटकीले वस्त्र और उत्तम भोजन विशेष प्राप्तिसे भजनमें बाधा पड़ती है । भजनके लिये साधारण अन्न वस्त्रही उत्तम है । पक्षियोंके शरीर पर परमात्माने ऐसा वस्त्र पहनाया है कि, उसके आगे मनुष्यके उत्तम २ बहुमूल्य रेशमी वस्त्र भी तुच्छ