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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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होते हैं । यदि कोई उसको काटे अथवा टुकड़ा २ करे तो जितने दाग उसकी देहमें होते हैं सब पालपीके स्वरूपकेही हो जाते हैं । इस जानवरमें यह विचित्र गुण है । उसको पेड़ पल्लवसे पृथक करना कठिन है, पालपीके अण्डेसे वृक्षकी शाखायें निकलती हैं जैसे बीजसे वृक्ष उगता है उसकी जड़ भी प्रतीत होती है ।

विद्वानोंका मत—इसमें नलके समान शाखायें होती हैं जिसके द्वारा उसको भोजन पहुँचता है, लोग इसे बहुत कालसे जीवधारी वृक्ष समझते थे । पर सन् १६९९ ई० और १७१७ ई० तक बहुत बड़े विज्ञानिकोंने निश्चय कर लिया कि, इसमें जीवनशक्ति है । प्लेटेनी और अर्संता तालीस नामक विद्वानोंने भी इसे जीवधारी ही कहा है । वह जो जीवधारी वृक्ष कर कहलाता था अब पालपी मछलीके नामसे प्रसिद्ध है । तारा नामक मछली भी इसी प्रकारकी होती है ।

एनीमोन ।

एक प्रकारका जीवधारी है, प्रायः समुद्रके किनारे पहाड़ोंके चट्टानोंके नीचे जहाँ कि, ज्वार भाटा आया करता है वहाँ पाया जाता है । यह पश्चिमी समुद्रोंके किनारे सुनहरी फूलोंके खिले हुये गुच्छोंके समान दीख पड़ता है, वहाँ वाले उसको जीवधारी फूल बोलते हैं । वह भी खिला हुआ दीख पड़ता है मानो मूरब्बाका डला जमा हुआ हो । उनमेंसे गायके दुमके समान चढाव उत्तराव बने हुये होते हैं जो उनके मुखके समान मालूम होता है प्रत्यक्षमें तो वह जड़के समान शक्तिहीन जान पड़ता है पर ऐसा खाऊ होता है कि, नदीके लहरके हटतेही मुंहको पसारकर सन्मुख आये हुये सभी कीड़े मकोड़ोंको खाकर, ज्योंका त्यों स्थिर हो जाता है । दूरबीन यन्त्रसे देखा गया है कि, उनके मुंहके निकट किसी प्रकारकी खटखटाहट होवे तो, उनके मुखसे एक प्रकारका शब्द होने लगता है मुंहके तार हिलते देख पड़ते हैं यद्यपि इस जीवधारीमें देखनेकी कोई इन्द्री नहीं जान पड़ती तो भी प्रकाशकी अधिक्यतासे बहुत घबराता है । इसमें अपनी जातिकी उन्नति करनेकी एक आश्चर्यमय शक्ति जान पड़ती है । यदि उसके शरीरको ऊपर नीचे आड़े ठाड़े किसी प्रकारसे काटा जावे तो उसके सब अंश वैसेही जानवर हो जावेंगे । उसके मुखसे जीवित बच्चे भी उत्पन्न होते हैं मुखसे निकल पासके चट्टानपर जाकर जम जाते हैं उनसे फूलकी कलियोंके समान अनगिन्ती बच्चे उत्पन्न होते हैं इसी प्रकार इस प्राणीकी उन्नति होती रहती है । इसका रङ्ग फीका, लाल तथा हरा होता है, इसका मुख किनारे पर