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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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“चारों वेद लौकिक पारलौकिक (स्वर्ग आदि) ज्ञानोंके भंडार हैं, इनके उपदेशोंको सुनकर उनके ऊपर चलनेवाला मनुष्य लोकमें सुखी रहता और लोकमें स्वर्गीयोंको सुखोंको पाता है, फिर कर्मके क्षीण होने पर संसारमें जन्म लेता है। यह परसम्बेद अर्थात् संसारकी मर्यादा बना रखने और उसकी बृद्धिका सच्चा कानून है। फिर आप इसी चौवीसवेंही प्रकरणमें लिखते हैं। यही अविनाशी वेद संसारके समस्त ज्ञानके मूल भंडार हैं” इत्यादि। देखो २४ वां प्रकरण पृष्ठ. ४३।

अब मैं आपके सिद्धान्तको उपनिषत् गीताके प्रमाणसे मिलाकर पाठकोंको बतलाता हूँ—

पहले उपनिषत्को लीजिये देखिये वह क्या कहती है—

मुंडक उपनिषत् प्रथम मुंडक.

मंत्र ३ शौनको ह वै महाशालोऽङ्गिरसं विधिबहुपसन्नः पप्रच्छ । कस्मिन् भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति ॥ ३ ॥

शब्दार्थ—प्रसिद्ध महागृहस्थ शौनकने विधिपूर्वक अङ्गिराके निकट आकरके प्रश्न किया “हे भगवन् ! किसको जान लेनेसे सर्वका ज्ञान हो जाता है ॥ ३ ॥

विवेचन—शुकने ऋषिके पुत्र शौनकने भारद्वाज ऋषिके शिष्य महर्षि अङ्गिराकी सेवामें विधिपूर्वक अर्थात् भेंटादि लेकर प्राप्त हुआ और समय देखकर उनसे प्रश्न किया कि, हे भगवन् ! वह क्या है ? जिसके जानलेनेसे सब कुछ जानने में आता है।

शौनकके उपर्युक्त प्रश्नको सुनकर अङ्गिरा ऋषिने उत्तर दिया—मुंडक उपनिषत् मुंडक प्रथमका मंत्र ४ ॥—

तस्मै स होवाच । द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद् ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च ॥ ४ ॥

उसपर शौनक ऋषि बोले—दो विद्या जानने योग्य है, उसे ब्रह्मविद् ज्ञानी परा और अपरा कहते हैं अर्थात् जब शौनकने प्रश्न किया तब अङ्गिरा ऋषिने कहा—हे शौनक ! ब्रह्म (वेद) के जाननेवाले तत्वदर्शी महात्मा लोग दो प्रकारकी विद्या बतलाते हैं—उनमें एक परा कहलाती है और दूसरी अपरा। उसमेंसे अङ्गिरा ऋषि पहिले अपरा विद्याको बतलाते फिर पराको ॥ ४ ॥

तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति । अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥ ५ ॥

उसमें—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण,