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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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था एवं शिर हिलाते हुये बड़ी आन बानसे चलता था, चेमलेन सोंपकी तरह वह भी कपड़ा बदलता रहता है।

मकड़ी ।

मकड़ी एक प्रकारका कीड़ा है। प्रत्यक्षमें उसका शिर बाहर नहीं जान पड़ता। उसके अङ्ग उसके शरीरमें इस प्रकार लगे हुये होते हैं कि, तनिक छूनेसेही गिर पड़ते हैं। नरके पाँव अनेक लटकन होते हैं। मकड़ीके पाँव बहुत छोटे २ होते हैं इसी कारण वह गिर पड़ती है। उसके पाँव कुण्ठयाके समान होते हैं सामने पाँवमें टेढ़ी कठिया होती है जो हिलती है। नीचेकी ओर टेढ़ी हैं उसके नीचेकी ओरका एक टेढ़ा छिद्र होता है जिस पथसे कि, वह बिष निकालती है विष अपने पास रखती है उसके ऊपर एक पाँतर है उसमें बही प्रभाव है जो कि, शिरके स्थान प्रगट करती है। इसमें एक और टुकड़ा मिला होता है वह हिला करता है वह उसका नरम पेट हैं। इस देहके टुकड़ेमें चार अथवा छः गोली निकली हुई होती है। वह मांससे गठीली होती है सभी गोल तथा एक दूसरेसे मिली हुई होती हैं उनके सिरपर अनेक छोटे छोटे छेद होते हैं इनही स्थानोंसे रेशमी तार निकालती हैं। एक प्रकारका मसाला है—जो कि, उसके पेटके भीतर की झोलीमें रहता है। रेशम ऊँचे नीचे बर्तनोंमें रहता है वे बर्तन बहुत मोटे और बहुत छोटे कदके होते हैं। उनकी जड़ एक दूसरेसे जमी हुई होती हैं वे बाहरी समानके साथ मिली हुई होती हैं। जो मसाला भीतरी बर्तनोंमें प्रगट होता है वह स्वच्छ गोंद और लेईके समान होता है। तीक्ष्ण मदिरा अथवा जलसे नहीं गल सकता जब झुकाया जाय तो टूट जाता है। वह दुमदार तथा लचीला तभी होता है वह पतला पतला तार बनाया जावे यह गुण उससे निकलता है। बराबरसे अनेक छोटे २ बाल होते हैं, उनकी राहसे वह मसाला निकलता है, वे शून्य सूत काटनेवालेके स्थानपर लगे हुये होते हैं, एक कातनेके स्थानपर सहस्र २ बाल अथवा बूँद रहती हैं। इनहीसे गाढ़ा लार बूँद २ करके निकलता है, जिस समय वह बाहर निकलता है तो वायु लगतेही सुन्दर तथा महीन बन जाता है। प्रत्येक कातनेवालेके तार पहले मिले रहते हैं। जब वह किसी वस्तुसे लटकाती है उसमें बहुतेरे पदार्थ संयुक्त रहते हैं। पहले मकड़ीका तात्पर्य यह रहता है कि, वह अपने तारको किसी स्थानमें लगादे। इसके बाद अपना जाल बना किसीसे लगा देती है। इससे लगाकर अपने प्रत्येक चरखोंसे निकालती है। मकड़ी अपने पिछले पाँवको तकमेकी तरह काममें लाती है। उसके द्वारा वह अपने शरीरसे बराबर तार निकालती जाती है, इस मकड़ीकी तारकी बनावटमें भेद होता है।