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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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ब्राह्मणकी सली प्रकार सेवा नहीं की, न कुछ दियाही, तब वह निराश होकर वहाँ से लौटा आ रहा था उजाड़में पहुँचा वहाँ घोर बन था दूर दूर तक बस्ती नहीं थी। उसमें बटका बहुत वृक्ष दिखाई दिया ब्राह्मण बट वृक्षके नीचे पहुँचा देखा कि, आठ दश मनुष्य झाड़ू दे देकर भली प्रकार सफाई कर रहे हैं। ब्राह्मणने उनसे पूछा कि, तुम कौन हो, क्यों सफाई करते हो ? उन लोगोंने उत्तर दिया कि, हम सांपोंके ब्राह्मण हैं, सब सर्प हमारे यजमान हैं। यहाँ हमारे अनेक यजमान रहते हैं। हम उनके लिये यह स्थान साफ कर रहे हैं, रातके समय हमारे सब यजमान यहाँ आवेंगे। यदि तुम गाना बजाना सुनना चाहते हो तो इसी स्थान पर रहो पर भयभीत न होना, मेरे यजमान आवें तो निडर होकर बैठे रहना वह ब्राह्मण इनके कहनेसे उस स्थानपर बैठा रहा। रातको राग, बाजा और बीन इत्यादि बजना आरम्भ हुआ। रातके दश बजेसे सांप आने लगे फर्श पर अपने अपने स्थान पर बैठने लगे। सभा जमी। बहुत सांप एकत्रित होगये। सांपोंके पुरोहितने बीचमें एक गद्दी लगाई। मानों वह राजसिंहासन था जो बहुत टीप टापके साथ रक्खा गया था दूधसे एक कड़ाह भरकर रखा गया उसमें बहुतसी चीनी मिलाई गई। सब सांप आचुके तब एक बहुत बड़ा और महा प्रबल काला सांप आया, बीचके राज सिंहसनके पास आकर सिंहसनके समीप नीचे अल्पकाल तक बैठकर फिर चला गया इसके पीछे वही सांप फिर आया। पृथिवीसे हाथ भर ऊँचा शिर उठा ऊपर छत्री फैलाये हुए चला आता था उसके शिरपर एक वित्तेभरका अत्यन्त सुन्दर श्वेत सर्प बैठा था। वही सबका राजा था सब सांपोंने उठकर उसकी बहुत प्रतिष्ठा की। काले सांपने अपना शिर सिंहसनसे लगा दिया बादशाह काले सांप के शिरसे उतर कर सिंहसन पर बैठ गया। राग तथा गीत इत्यादि सुनने लगा। दूसरे सर्प राजाके ईर्द गिर्द बैठे हुए नम्रता पूर्वक गाना सुन रहे थे। थोड़ीसी रात रह जाने पर सांपोंका राजा दूध पीकर चल दिया। उसके पीछे दूसरे सर्पभी अपनी पदवीके अनुसार दूध पी २ कर चले गये। सबेरा होगया उस दिन भी उन आदमियोंने उसी स्थानपर डेरा किया। दूसरी सांझ हुई उसी प्रकार राग रंग आरम्भ हुआ। उसी प्रकार सब सर्प आने लगे, गये दिनके समानही सर्पोंकी सभा जम गई। जो सर्प आता था वे अपने मुँहसे अर्शाफियां उगलता जाता था। वहाँ फर्श पर अर्शाफियोंका ढेर लग गया सांपोंका पुरोहित ब्राह्मण प्रत्येक नागके घरानेका नाम ले लेकर उनकी प्रशंसा करता जाता था। उन सर्पोंके घरानेके नाम और चिन्ह उनके पास लिखे थे। सर्पोंका बादशाह आया तो उसने भी मुँहसे एक अमूल्य मोती उगल दिया। एक सांपने दो अर्शाफियां ब्राह्मणके सामने धरदी ब्राह्मणने दोनों