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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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करते हैं । एतवारके दिनको भली प्रकार पहचानकर व्रत रखा करते हैं । पंजाब तथा हिन्दुस्थानके लोग यों कहा करते हैं ।—

एतवारकी रात कराड़ी । गीदड़ दौत न लावे बाड़ी ॥

कुत्ता

कुत्ता बड़ा कृतज्ञ, नमक हलाल, चौकस तथा स्वामीपर प्राण देनेवाला पशु है इसी कारण लोग उसको पालते हैं, पुस्तकों तथा मनुष्योंमें कुत्तोंके बडे २ गुण प्रगट हैं । कुत्ता मनुष्योंके घरोंकी बहुत चौकसी करता है । कृतज्ञताके साथ अपने स्वामीकी अधीनतामें रहता है । संसारमें कुत्तों के अनेक गुण और बुद्धिकी बातें प्रसिद्ध हैं ।

राम कालका श्वान—पुराणोंमें लिखा है कि, महाराज रामचन्द्रजीके समयमें एक संन्यासी अपना पेट भरकर बची रोटी सिरहाने रखकर सो गया, उसने सोच लिया था कि, बची रोटियोंको सौझको खावेंगे । जब वह अचेत होके सो गया तो उसी वृक्षके नीचे एक कुत्ता बैठ था, उसने संन्यासीके सिरहानेसे वो रोटी खींच एक स्थानपर भूमिमें दबा दिया, आप चुपचाप उसी जगह बैठ रहा । वह संन्यासी सोकर उठा, अपनी रोटी न पाकर इधर उधर देखने लगा कि, मेरी रोटी कौन ले गया ? जान लिया कि, और तो कोई नहीं, मेरे समीप केवल यह कुत्ता है, इसीने मेरी रोटी खा ली । क्रुद्ध होकर कुत्तेको एक डण्डा मारा, जिससे कुत्तेकी एक टाँग टूट गयी । कुत्ता श्रीरामचन्द्रजीके निकट जाकर चिल्लाने लगा । महाराजाने उस संन्यासीको बुलाया पूछा कि, तुमने उस कुत्ते को क्यों मारा ? संन्यासीने उत्तर दिया कि, यह कुत्ता मार खानेके ही योग्य था, पहले तो इस कुत्तेमें यह दोष है कि जब किसी साधुको देखता है तो भूंकता है—जब वे रोटी मांगने जाते हैं तो यह उनको काटने दौड़ता है, दूसरा इसमें यह दोष है कि, रातको चिल्लाता है सोने नहीं देता । तीसरा प्रातःकाल भजनके समय सो जाता है । चौथे यह मार्गके बीचों बीच बैठता है । पाँचवें जब कोई कहीं चलता है तो यह कान फटफटाता है, उसके कान फटफटानेसे काम नहीं होता छठे मने सौझके लिये रोटी रखी थी यह निकाल कर खा गया । इसी प्रकार इसमें अनेक अवगुण हैं, इस कारण मारनेके ही योग्य है । महाराजाने कुत्तेसे पूछा कि, तू अब इसका उत्तर दे । कुत्तेने कहा कि, मैं साधुओं को देखकर इस कारण भूंकता हूँ कि, तुम तो संसारसे विरक्त होकर साधु हो गये, अब द्वार द्वार पर भिक्षा क्यों मांगते हो । परमेश्वर पर क्यों नहीं निर्भर रहते, क्या वह तुम्हें तुम्हारा भोजन नहीं पहुँचावेगा ? जो अभी तक सांसारिक मनुष्यों के अधीन बने फिरते हो, यही साधूपना है अथवा धूर्तता है ? रातभर मैं इस कारण