कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextहो जाता है जिससे वह ज्ञान नहीं होता कि, आत्मा किधरसे आती है कहाँ जाती है कहाँ रहती है । मैंने यहाँ थोड़े ही प्रमाण इसके लिये लिखे हैं । जो ध्यानपूर्वक यहूदी, ईसाई और मुसलमानोंकी पुस्तकें देखेगा वो सहस्रों प्रमाण दे सकेगा । इस देशमें मुसलमानोंकी हदीस मिल सकती है । उनकी पुस्तकोंसे भली प्रकार आवागमन ऐसा प्रमाणित होगा जिससे तनिक भी सन्देह न रहेगा । जितना हम लिख चुके हैं वही उनके धर्मग्रन्थोंसे आवागमन सिद्ध करनेके लिये पर्याप्त है । किन्तु जागते हुये सोनेवालोंको कोई जगाने वाला भी नहीं है ।
अध्याय १९.
जानवर ।
अब विचारना चाहिये कि, आत्माका स्वरूप कैसी है जो चौरासी लाख योनिमें आवागमन करती हुई समस्त स्थानोंपर वर्तमान है । उसका स्वरूप बतानेमें भी असमर्थ है । वह कहने सुनने और देखनेमें नहीं जाती । मनुष्य तथा पशुके पास जितने यन्त्र हैं उनसे वह कभी पकड़ी भी नहीं जा सकती । वही सबमें है तनिक विभिन्नता भी नहीं है । सबको एकसा दुःख सुख हो रहा है । पर जिसमें बुद्धि है जो सत्य मिथ्याको पहचान, झूठसे अलग होकर सत्य धारण करता है वही मनुष्य है बाकी सब मनुष्य हों या पशु, पशुसमान ही हैं । पशु मनुष्योंसे किसी विषयमें भी कम नहीं है इसी कारण मैं यहाँ पशुओंकी बुद्धिके विषयमें कुछ लिखता हूँ ।
बन्दर
अब मैं पशुओंमें पहले बन्दरका हाल लिखता हूँ । बन्दर मनुष्यके स्वरूपके होते हैं । उनका सब ढङ्ग मानुषिक होता है, इसी कारण उसे वानर यानी विकल्पसे मनुष्य कहते हैं पर उनके पाँवके अँगूठे उँगलियोंके सदृश होते हैं उनकी एड़ी बहुत छोटी होती है उनका सब आकार मनुष्योंकासा होता है । वे मनुष्योंकी सब नकल कर सकते हैं । वे नाना प्रकारके होते हैं । यहाँ बन्दरोंकी बुद्धि को कुछ कहानियाँ लिखता हूँ ।
चोर पकड़नेवाला बन्दर—पञ्जाब फीरोजपुर धर्मकोट गाँव के समीप मैंने सुना था कि, एक कलन्दर चला जाता था । उसके पास तीन चार बन्दर थे । कुछ जमा जथा भी था । उसी लालचसे उजाड़में उसको तीन चार चोरोंने घेर लिया, मारकर सब असबाब छीन उसके बन्दरोंको भी मार डाला पर उनमेंसे एक बन्दर बच निकला । वह भागकर एक वृक्षपर चढ़ गया । चोरोंने