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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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प्रकारके स्वरूप स्वभाव तथा रङ्ग ढङ्ग हैं जिनका वर्णन करना नितान्त कठिन है। वे सब अपने पूर्वकर्मोंसे ऐसे हैं। वो सब आवागमनका कारण है।

९०—खुदाने आदमीको अपने स्वरूपका बनाया है। यदि यह लद्दुनी विद्या पावे आप अपना स्वरूप पहचाननेका उद्योग करके विद्या उत्पन्न करे तो इसमें तथा परमेश्वरमें किसी प्रकारकी विभिन्नता नहीं रह जाती नहीं तो पशुओंकी तरह यह भी आवागमनमें रहेगा।

९१—किदम तथा हद्दस दो शब्द हैं। किदम परमेश्वरके लिये और हद्दस संसारके लोगोंके लिये है। परमेश्वरकी स्थिति तथा संसारका विनाश है। इन दोनोंमें आत्मा क्या है। यदि हदीस है तो शरीरके साथ उसका विनाश है यदि शेष है तो परमेश्वर है दोनोंके बीचमें आवागमन है अथवा इन दोनोंके मध्यमें अज्ञान है उसीको आवागमन होता है।

९२—पुरुषार्थ और प्रारब्धका बड़ा झगड़ा चला आता है। वोही सब अज्ञानकाही कारण है। जब अन्तःकरण प्रकाशित हो भीतरी गुप्त भेदको देखले तो फिर आवागमन नहीं होता।

९३—महाबीर—जैन धर्ममें पुरुषार्थ और भाग्यका इसप्रकार उदाहरण सुना था कि, लोगोंने ऋषभनाथजी तीर्थकरसे पूछा कि, महाराज! आपके घरानेमें आपसा और भी कोई होगा? तब उन्होंने अपने पौत्र महाबीरनाथकी ओर सैन की कि, यह अन्तका तीर्थङ्कर होगा। यह बात सुनकर वह घमण्डी होकर कुचाली हो गया। इस कारण उसने कितनेही जन्म कीड़े मकोड़ेमें लिये बहुत दुःख पाया। कितने ही योनियोंमें मारे मारे फिरनेके पीछे अन्तमें तीर्थङ्कर हो गया। यदि पुण्य करता तो ऐसा न होता। इस कारण जो कोई अपनेको भाग्यवान् सुनकर पापका काम करेगा वह हीनावस्थामें पड़ेगा। यदि उत्तम भाग्यवाला शुभ पुरुषार्थ न करे तो नष्ट हो जावेगा।

९४—वैज्ञानिक—कमिस्टरी (रसायन) विद्याके ज्ञाता मिस्टर लाईपेक और मिस्टर बोसझाल कहते हैं कि, जो पशुओंका मांस खाता है। वस्तुतः वही साग, पात, बेल, बूटा, आदि होता है। वह स्वरूप बदलकर दूसरी बेर खानेमें आता है। जिसके द्वारा इस जीवका शरीर पलता है। इस प्रमाणको मैंने मांसाहारके प्रकरणमें लिखा है। परन्तु यहाँ भी इसका लिखना आवश्यक हुआ। इन दोनों विद्वानोंका कथन भारतके ऋषीश्वरोंके ही कथनके अनुसार है। भारतके ऋषीश्वरोंने लिखा है कि, पापिष्ठी मनुष्य सुषुप्ति अवस्थामें जाते हैं, वह जड़ पदार्थोंकी है। जिनका मांस उन्होंने पूर्वजन्मोंमें खाया, वे साग पात होकर अपना बदला देते हैं। यही ठीक आवागमनका स्वरूप विद्वान् लोग प्रगट करते हैं।