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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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पतला है। कोई सुखी और कोई दुःखी है। कोई अच्छी दशामें है, कोई दुर्दशाग्रस्त अवस्थामें पड़ा है। कोई तपस्वी तथा साधु है। कोई उच्चका लुच्छा पाजी बदमाश है। कोई कोमल कोई कठोर कोई भाग्यवान कोई महा अभागा कोई शान्त कोई क्रोधी कोई विशुद्ध और कोई कलुषित है। यदि पूर्ववका कर्म न होता तो सबका एकही ढङ्ग होता।

८०—पाठशालामें एकही पिताके दो पुत्र एक साथ पढ़ने बैठे। एक तो पढ़कर शोध्दही विद्वान हो गया। दूसरा कठिन परिश्रम करनेपर भी मूर्ख रह गया। उसका परिश्रम किसी काम न आया।

८१—यदि इस जीवने पहले कर्म नहीं किये थे तो उसके शरीर पर कम्मोंके चिन्ह किसने बनाये? भूखेको डकार नहीं आती। बिना कम्मोंके देहपर कम्मोंके चिन्ह नहीं बन सकते, बिना तेलके कभी दीपक भी जलता है? बिना तेलवाले पदार्थके तेल नहीं निकलता।

८२—ज्योतिषी वर्ष फल बनाकर भलाई बुराई सब कुछ पहलेसेही कह देते हैं। वैसाही सामुद्रिकी शारीरिक चिन्हसे कहते हैं।

८३—यदि हमारे पूर्वके कार्य हमको न रोकते तो हम अपनी समस्त कामनायें पूर्ण कर लेते। हमको रोकनेवाला कोई नहीं था।

८४—यदि पहले कर्म न करते तो कम्मोंके बन्धनमें न फँसते।

८५—हम अपने भाग्यके दास हैं फिर परमेश्वर हमारी क्या भलाई बुराई कर सकता है। निर्गुण तथा सगुण कर्म बन्धनोंमें फँसकर दुःख सुख भोगा करते हैं। जो दुःख सुखसे पृथक् है वे ही कम्मोंके बन्धनमें नहीं आते।

८६—निरञ्जनने कम्मोंका जाल बनाया, आपही उसमें फँस गया जो कोई कम्मोंसे मुक्तको पहचाने वही मुक्त है। शेषके सब आवागमनमें हैं यही साधारण नियम है। निम्नलिखित कवितामें विस्तारके साथ यह निरूपण करते हैं कि, सबकाही आवागमन होता है उससे कोई बचा हुआ नहीं है।

मुखम्मस तर्जीअबन्द

बनी आदम व हैवां मोरो मलख। हैं करते योनि योनिमें तना सुख ॥

सदा करते हैं कर्म अपने पासख। न इसमें शक है ऐ ईमान रासख ॥

तनासुख देखता हूँ मैं तनासुख

वही ब्रह्मा वही चिउँटी हुआ है। हो सदहा बार पैदा फिर मुआ है ॥

जिधर जावे तनासुखका कुआ है। वही माई वही खाला बुआ है ॥ तना० ॥